
निर्वासित गौरैया
मां मुझको कुछ दाने दे दो गौरैया मिलने आई है
चुं चूं करके मुझे बुलाती शायद भूखी प्यासी है
रविवार को माली बाबा ने जिस डाली को काटा था
तुझे पता है उस डाली पर उसका एक घरौंदा था
टूटी डाली संग टूट गए थे उसके जो भी सपने थे
कितना रोई थी वो बेचारी घायल चूजों को देख के
मुझको तुम बतलाओ तो क्यों डाली को काटा था
क्यूं हमने उसका घर तोड़ा क्या भूमि को हड़पा था
फुदक फुदक कर दिनभर अम्मा वो मुझको गीत सुनाती थी
पंख फैला कर कैसे उड़ना है मुझको रोज सिखाती थी
जैसे तुझको प्यारा लगता हूं मैउसको भी अपने बच्चे प्यारे थे
नभ नापेंगे वो सब एक दिन ना जाने मन में कितने सपने थे
किसी पहाड़ की चोटी पर फुदक फुदक वो चहकेंगे
नीचे बहती छोटी नदियां में डुबक डुबक पंख को धोएंगे
टर्र टर्र करते दादुर छोंनो को कुएं पर खूब छकाएंगे
जब वो आयेंगे उनसे मिलने फुर्र फुर्र कर उड़ जायेंगे
बड़ी नदी में रहने का भेद नकुल बकुलों से जानेंगे
पंख सूखे रखना है कैसे जब पार नदी को करना है
मित्र शुक बटुक से जानेंगे कैसे सीखें दूजों की बोली
वो मीठे फल चुन लेते हैं कैसे रिट्टू तोता कहलाते क्यूं
अमराई में छिप कर बैठी कूक रही है जो कोयल
