विश्वास की जमीं पर
अपनत्व की नमी पा
पनपता है प्यार
धीरे धीरे
सहअस्तित्व की
स्वीकार्यता लिये हुए
खिलते हैं पुष्प
मकरंद से भरे हुए
बिखर जाती है सुगंध
यहां-वहां हर जगह
नफरत का क्या है
नागफनी सी
उग आती है
शुष्क रेगिस्तान में
बिना किसी देख भाल के
काँटो के भरी हुई
करती है बस
हृदय विदीर्ण
तेरा भी और मेरा भी

