मैं, बचा लेता
कटते जंगल
सूखती नदी 
दरकते पहाड़
सिमटती घाटी
मुरझाते फूल
चिड़िया के नीड़
बसंती बयार 
गुम होती गौरैया 
हृदय में प्रेम 
होठों पर गीत
युध्द के उद्घोष
प्रेमियों के बिछोह
भूखे की रोटी
समंदर में मोती
मनुष्य में मानवता 
नीलाभ प्रेमरंग वाली 
स्त्री की चुनरी
प्रभु ने कहा 
गर चलती मेरी मर्जी
बचा लेता 
अपने लिए
थोड़ी सी धरती 



मैं, बचा लेता
नानी की कहानी 
मां की लोरी 
दादी के गीत
धरती के जंगल 
जंगल में शेर
गांव में स्कूल 
स्कूल में लड़की
शहरों में पार्क
पार्क में खेलते बच्चे
बचा लेता 
घृणा की खेती
खेती में उगी बंदूक
युद्ध की विभीषिका
बच्चा बोला
गर चलती मेरी मर्जी
बना देता
बिना सीमा रेखाओं वाली धरती