सीमाएं तो होती हैं बस देह की
मन को बंध कहां होते हैं
जो फलक पे उगता चांद देख ले
वो कैसे दृष्टिबाधित
जो विहगों से संवाद साध ले
वो कैसे वाणी वंचित
जिसको सुनता हो भ्रमर गीत
वो कैसे श्रवण सुन्न
जो मन सतरंगी इन्द्रधनुष रंग दे
उसको कैसा अवसाद
जिसने सीखी हो प्रेम की भाषा
उसका कैसा मनो विकार
जिसका अवचेतन जाग्रत हो
फिर वो कैसे बुद्धि मन्द
जो संकल्पों से हर सिद्धि कर ले
वो कैसे हुआ दिव्यांग
जो जीता हो जीवन संघर्षों के संग
वो कैसे हुआ अपंग
जो इरादों की पतवार बना सिंधु तार ले
वो कैसे हो सकता है विकलांग
जो आपदा को अवसर में बदले
वो कैसे हुआ कमतर किसी से
जिसके आगे हर चुनौती लगती हो बौनी
वो कैसे हो गया असक्षम
ये तो होते हैं बस आकाश में टंगे चांद
जिनके जिम्मे है काली अंधियारी रात
पर सुनो इनकी हंसी जिससे
झरती है पुलकित चांदनी
जो अपने प्रेम पगी रश्मि से
भर देती है जग में उजास
जिसे देख राधा माधव संग
सृष्टि करे विलास
जो भर रही होती है निशब्द
कली कली में सुरभित सुगंध
जिसके स्पर्श मात्र से
खिल उठते हैं निशित प्रसून
बिना शर्त सम्मलित करने होंगे
उनके दुख अपनी खुशियों के संग
बिना जताए अपना गुरुत्व भार
बन जाएं उनके सपनों में साझीदार
प्यार से ऐसे अंकमाल में भर लें
जो हर कमी की भरपाई कर दे
वे दान नहीं संवेदना के साथ
चाहते हैं गरिमा पूर्ण व्यवहार
अच्छे जीवन पर उनका भी हक है
दया के नहीं सम्मान के साथ
देह से नहीं हिम्मत जीती जाती हैं जंग
आओ सीखें इनसे जीवन के चंद गुरु मंत्र
#Disabilityday


