
सीमाएं तो होती हैं बस देह की
मन को बंध कहां होते हैं
जो फलक पे उगता चांद देख ले
वो कैसे दृष्टिबाधित
जो विहगों से संवाद साध ले
वो कैसे वाणी वंचित
जिसको सुनता हो भ्रमर गीत
वो कैसे श्रवण सुन्न
जो मन सतरंगी इन्द्रधनुष रंग दे
उसको कैसा अवसाद
जिसने सीखी हो प्रेम की भाषा
उसका कैसा मनो विकार
जिसका अवचेतन जाग्रत हो
फिर वो कैसे बुद्धि मन्द
जो संकल्पों से हर सिद्धि कर ले
वो कैसे हुआ दिव्यांग
जो जीता हो जीवन संघर्षों के संग
वो कैसे हुआ अपंग
जो इरादों की पतवार बना सिंधु तार ले
वो कैसे हो सकता है विकलांग
जो आपदा को अवसर में बदले
वो कैसे हुआ कमतर किसी से
जिसके आगे हर चुनौती लगती हो बौनी
वो कैसे हो गया असक्षम
ये तो होते हैं बस आकाश में टंगे चांद
जिनके जिम्मे है काली अंधियारी रात
पर सुनो इनकी हंसी जिससे
झरती है पुलकित चांदनी
जो अपने प्रेम पगी रश्मि से
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