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सुनो क्या कहती हैं लहरें

बैठ किनारे सागर के देखा है अक्सर मैनें

आती जाती उठती गिरती लहरों को 

कभी छोटी कभी बड़ी बन कर आती हैं

नित निरंतर अपनी ही सीमायें छूने को

समेट ले जाना चाहती हैं जो कुछ भी

छूट गया था पीछे को


देख रहीं हैं मुझे झिझकी सिमटी सी बैठी अपने ही दायरे में 

हाथ पकड़ ले जाती मुझको अपनी ही गहराई में

सागर सा विस्तार पा विस्मित चहक उठी एक नदी सी

लो अब मैं भी बन जाती हूँ उत्तान्ग लहर एक ऊंची सी 


तुम अभी तक किनारे पर ही क्यों बैठे हो गुमसुम से

निर्लिप्त भाव से किसी शिला के जैसे जमे हुए 

मैं लहर बन कर आती हूँ तुम तक तुम को छूकर ले जाने

भिगो देना चाहती हूँ हर बार तूम्हें अपनी सी उमन्गों से 


कब तक यूँ ही सुखे हुए से बैठे रहना है 

अकेले ही किनारे पर निर्विकार से चुपचाप 

आओ चलें जल सिंधु में होकर लहरों पर सवार 

चलो लहरों की नाव पर नौकायन कर लें एक बार


चलो उगते सूरज की मीठी सी लालिमा चख लें 

पता लगायें कैसे भरता है बादल पानी मिल धूप के साथ में

कैसे रात हुई तो डूबा सूरज चांदनी ओढ कर बैठ गया

देखो कैसे दौड़ा है चांद तारों को लेकर अपनी झोली में


सुबह हुई तो मछुआरों ने अपने जाल बिछाये दिये हैं

गाते माँझी ने भी साहस के चप्पू साध लिये है 

रात हुई तो कोई नाविक तारों से रस्ता पूछ रहा है 

कोई तो मझधार से ही दूर किनारा ताक रहा है 


बच्चे गुब्बारों को देख फूले नहीं समाते हैं 

योगी भी एकांत पाकर यहाँ ध्यान लगाते हैं 

प्रेमी जोडे बैठे हैं दुनिया से छिपके कोने में 

कोई अपना एक घरोंदा बना रहा है गीली रेत में


कुछ लड़कियाँ सीपी चुनती हैं माला में पिरोने को

वाद्ययंत्रों की धुन पर लड़के झूमें नृत्य की मस्ती में 

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