निराशा की स्याह रात
बन जाती है
सुनहरी भोर
पीड़ा के बादल में
उभर आता है
इंद्रधनुष
अवसाद की धुंध में
खिल उठता है
मुरझाया मन
हार के पतझड़ में
खिल उठता है
विश्वास का बसंत
बेरंग जीवन में
भर जाते हैं l
फाग के चटख रंग
उदासी में
भर जाती है
खिलौनो की खुशी
पिता के साथ होने से ही
बदल जाया करती है दुनिया


