बस थोड़ी सी भूमि पर 

हवा का पालना झूल

पीकर स्नेह नीर 

नरम धूप की अंकमाल में

प्रेम जैसे ही पनप जातें हैं 

ढाई आखर के वृक्ष

लुटाते है सहर्ष प्राण 

असीमित आजीवन 

प्रेम के निश्छल उपहार

वृक्ष होते है प्रेम के पर्याय


कलियों को भ्रमर गीत 

तितलियों को मकरंद

समीर में सौंधी सुगंध 

पक्षी को नवल नीड


वीभिक्षु को मृदु फल

पथिक को शीतल छाया

धरा को हरित वसन 

ऋतुयें भरे चुनरी में रंग


हवाओं में कलरव गीत

नदीयों में पुण्य मिठास

प्रेमियों को गुप्त कोटर

रात रानी को मृदु चन्द्र हास 


पुष्प लदी लताओं को संबल

स्त्री वेणी में गूंधे पुष्प गुच्छ

फागुन के अतरंगी रंग

बसंत में भर दी पीत उमंग


सावन को भेजे नेह निमंत्रण 

शरद को प्रथम शीत लहर

अमराई में कोयल कूक

 शुष्क बादलों में नेहनमी



ठंडे चूल्हे में जठर आग

खेत खलिहानों में अन्नकोठार

अटूट धागे से बंधी है मन्नत 

  नभ छूती झूले की पींग


सूरज को धूप से मुक्ति

चांद से लुका छिपीई

तारों को दिन की सराय 

बूंदों को पत्तों की छतरी


सिया राम का कंदमूल

राधा माधव उर कदंब माल्य

महाबुद्ध को बोधी ज्ञान

महावीर को कैवल्य मार्ग


शिव सम करते स्वयं विषपान

जीवों को कर अमृत दान

ढाई आखर के वृक्ष में समाहित

 हैं देवों सी अपरिमित शक्ति


ढाई अक्षर वाले त्रिदेव

ब्रह्मा विष्णु और शम्भु का

ढाई आखर का प्रेम

ढाई आखर की भक्ति


मनुष्य सीखता 

क्यूं नहीं है वृक्षों से 

क्या होता है

कैसे किया जाता है प्रेम


प्रेम तो बस समर्पित भाव

फिर उसे क्यूं चाहिए होती है

सबके हिस्से की

सारी की सारी जमीन 


भू प्रेम से अधिक प्रिय

भू अधिपति बनने को

उसकी ये अदम्य लालसा

मानवीय तो कदाचित नहीं


करना भूमि को यूं अधिग्रहीत

जिस पर वो तान सके

चंद सिक्कों के लिए

धुआं उगलती कोई मिल 



या बना ले

मटमैली सी एक

ऊंची सी इमारत

जिसमें रहते हैं

आत्ममुग्ध मनुष्य

इन वृक्षों के 

बोंजाई रूप