यूँ ही नहीं दरकते
चट्टानों से मजबूत रिश्ते
क्षरण होते है परत दर परत
अपनों की बेरुखी से
दरारें घर कर जाती है
धीरे धीरे यहां वहां
संवादों की कमी से
जमीं छोड़ने लगती हैं जड़ें
एक के बाद एक
शुष्क होती संवेदना से
ढहने लगते हैं संबंधों के पुल
सह अस्तित्व की अस्वीकार्यता से
दिन व दिन हीन होते प्रेम से
एक दिन वो गिर जाते हैं
भरभराकर
और रह जाते हैं बस
धूल के ग़ुबार
अफ़सोस
निंतान्त
सूनापन
सूखे आँसू


