"तुम प्यार का नाटक कर रही थी

मात्र अपने प्रमोशन के लिये इतना बड़ा छल"

अशोक जोर जोर से चिल्ला रहा था

"तुम कुछ बोलती क्यों नहीं

आखिर क्यों कर रही हो तुम मेरे साथ

ऐसा रूखा व्यवहार"

अमृता सुनती रही

फिर बोली

"मैंने तो वही किया जो तुमने किया अपनी पत्नी के साथ

प्यार का नाटक और विश्वास में छल"

"पर तुम्हें तो ये बात पहले से ही पता थी

कि मैं विवाहित हूं"

"हां पता थी

मैं तो तुम्हें आइना दिखाना चाहती थी

कि प्यार में छलना कितना दुख दर्द और पीड़ा से भर देता है।"

अशोक कुछ और बोलता उससे पहले ही अमृता फिर से बोली

"हम इतने स्वार्थी कैसे हो सकते हैं कि किसी को दुख में अपना सुख खोज लें ।

मुझे भी प्यार ने इस बात अहसास कराया है । कि मैं तुम्हें नहीं खुद को छल रही थी।"


वो रोकता रहा अपने प्रेम का वास्ता देता रहा पर अमृता अपना इस्तीफा मेज़ पर रख कर चल दी

उसे किसी को छलना नहीं था

खुद को भी नहीं