कुरुक्षेत्र की रण भूमि में
युद्घ सनातन जारी है
कुचक्रों का दौर चल रहा
रण में विजय पाने को
कूटनीतियां रची जा रही
शत्रु को मार गिराने को
नया सूर्य उदित हुआ है
नभ पे छा जाने को
अभिमन्यु अति उत्साहित है
अपना शौर्य दिखाने को
आवश्यक था जो रणकौशल
उसने गर्भस्थ ही पाया है
जान गये थे शत्रु सारे
पिता अर्जुन हैं साथ नहीं
महापराक्रमी व्यूह रच रहे
अभिमन्यु की हत्या के
वीर प्रतिष्ठित महारथी अब
अभिमन्यु के सन्मुख थे सब
अरि सेना के प्रतिभागी
धर्म मर्यादा सब भूल गए
व्यूह के चक्र भेद कर वो
केन्द्र बिंदु तक पहुंच गया
छल प्रपंच की छद्म युद्घ में
वीर बालक को घेर लिया
नीति नियमों की अनदेखी से
देखो युध्द अब होता है
साथी संगी पीछे रह गये
वीर शौर्य से लडता है
कोई भी अब साथ नहीं है
रण में विजय दिलाने को
चहुं ओर से घेर उसे
अरि सेना ने मार दिया
छला गया है अपनों से
उसको ये अब भान हुआ
कुलदीपक बुझ गया
अपने चरम तेज से पूर्व
शत्रु पराजय सुनिश्चित कर
वीर गति पा अभिमन्यु तो अमर हुआ
धर्म पताका के संवाहक
अभिमन्यु को ज्ञात है
विजय सदा उनको चुनती है
जो सदा धर्म के साथ हैं
भितरघात को भूल सदा
हम षडयन्त्रों से हारे हैं
ये दुर्भाग्य सदा से छलता
भारत माँ के वीरों को
इतिहास गवाही देता है
हारे है वीर सदा ही
अपने किसी भेदी की
स्वार्थ पूर्ण गद्दारी से
शूरवीरों की कथायें बताती
अन्दर के इन घातों की
विकट विडम्बना
अतीत स्वम को दोहराता है
ऐसे ही सदियों से
क्यों निष्फल हम
ढूँढ़ रहें हैं पृथ्वीराज को
जयचन्दों की टोली से


