हाँ माना के सफर बहुत लम्बा है,
पर थकना कहाँ मना है।
तू थक, पर फिर एक बार दौड़ लगा
तू गिर, पर फिर एक बार हो उठ खडा।
समंदर भी थकता है,
पर किनारे तक आने का साहस दिखाता है।
हर ढलती शाम,
नई सुबह का आगाज़ हुआ करती है।
वर्षा सूरज को कई बार दबोच लिया करती है।
चीटी तिनके तिनके से पेट भरा करती है
रोशनी गहरे अंधकार को परास्त किया करती है।
अगर नाविक समंदर से डरे,
तो अपना पेट कैसे भरे।
पर्वत की चोटी पर वही पहुँचता है,
जो गिरकर उठने का हुनर जानता है।
हाँ माना के सफर बहुत लम्बा है
पर गिरकर उठना कहाँ मना है।
हाँ माना के सफर बहुत लम्बा है,
पर गिरकर उठना कहाँ मना है।
-दिव्यांशु शर्मा


