शाम-ए-हयात कहाँ मुक़म्मल रही

हमसे उनकी शिकायतें बहुत थी


लफ्ज़ सटे रहे इश्क़ के इन लबों से यूही

बनाम सवालों, यहाँ जवाबों कि कमी थी


मरोड़ उंगलियाँ, अब गलती दिल मसोस रही

मनाते उसे पर हमसे उनकी नाराज़गी बहोत थी


हर उठते सवालो पर नजरें हमारी झुकीं रही

पोंछते वो आंसू पर वज़ह हमारी मौजूदगी थी


दबी सी बैचैनी, उसपर शर्म भी दुत्कार रही

यों गुज़र गयी वो शाम जो खुबसूरत होनी थी


- आशिष