यह दुनिया है; सब होता है!

An Introduction to The World of The World'


      प्रथम खण्ड - ' कर्म - भाव '













                                              

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    यह दुनिया है; सब होता है!


यह दुनिया है;

सब होता है।

कोई बचता है।

कोई रोता है।

कुछ होता है जब दुनिया में,

सब हंसते है।

सब सुनते है।

यह दुनिया है;

सब होता है।

सबकी दुनिया भी होती

है।

(१) 

कुछ लोग यहां पर 

गाते है।

कुछ लोग यहां

चिल्लाते है।

कुछ लोग यहां पर

लड़ते हैं।

कुछ लोग शहादत

पाते हैं।

यह दुनिया है;

                                                                     सब होता है।


  (२) 

 कुछ लोग यहां पर बात

करें।

कुछ लोग यहां पर

बहस करें।

कुछ लोग यहां भूले

बिशरे।

कुछ लोग यहां हैं,

 खो जाते।

  कुछ जन्म कहीं पर पाते

हैं।

गुणगान कहीं के गाते हैं।

मैं चिंतित सा हो जाता हूं।

ये लोग कहां से आते हैं।

                                                                    यह दुनिया है;

सब होता है।


(३) 

कोई खाता है।

                                                                      कोई खोता है।

                                                          सब मालिक खुद के होते हैं।

यह दुनिया है;

सब होता है।

फल लगते हैं,

सब खाते हैं;

जब ऋतु बसंत की आती है।

अपने संग वर्षा लाती है।

उससे बचने को दुनिया में,

 हर रंग के छाते बनते हैं।

यह दुनिया है;

सब होता है।


                                                                           (४)

                                                                    यह दुनिया है;

सब होता है।

कोई लिखता है।

कोई लिख देगा।

बन जाती फिर कुछ पुस्तक

हैं।

फिर धूल वहीं वो खाती हैं;

सड़ जाती हैं गल जाती हैं।

फट जाएंगे फिर पन्ने भी।

कोई लिखता है;

कोई लिख देगा।

फिर छप जाएगी,

खबर कहीं।

कुछ

लोग उसे

फिर पढ़ लेंगे।

मन को;

फिर विचलित कर लेंगे।

                                                           वो चाय की टपरी वाला फिर;

                                                                 वो खबर तुम्हारी ले

लेगा।

फिर पांच पकोड़े रख कर फिर;

वो खबर तुम्हारी बेचेगा।

 यह दुनिया है;

 सब होता है।


(५)

लिखते रहते हो,

दर्द हमेशा हमें

नहीं हमें यह भाता है।

ये दुनिया है;

सब होता है।

  प्रसंग करो जो,

प्रेरक हैं।


(६)

जो,

मधुर

कंठ के स्वामी हैं।

कुछ गीतों को गा देते हैं।

भा जाता हैं जो गीत कोई;

वह नित नेमित गा लेते हो।

गाकर मन बहला लेते हो।

अपने जीवन का शब्दकोश

मट मैला क्यों कर लेते हो।

जब गीत कभी गाने का

मन हो।

तुम स्वयं ही रचनाकार

बनो।

तुम स्वयं ही अपना

भाव बनो।

यह दुनिया है;

सब होता है।


(७)

यह दुनिया है उत्पादों

की;

यह दुनिया ही उत्पादित है।

तुम स्वयं यहां

उपभोगी हो।

तुम स्वयं यहां उपयोगी

हो।

यह दुनिया है;

सब होता है।


(८) 

अपने कर्मो में कर्म

भाव।

अपने कर्मो में धर्म भाव।

अपने कर्मो में शर्म भाव।

जब पालन इनका कर

लोगें।

जीवन में जीवन अंश कहीं

आचारों में तुम धर लो।

लालायित मन को कर

लो।

मन - चित्त धैर्य से

पालोगे।

तो मोक्ष गति अविराम

मिलेगा।

निश्चित ही अभिराम

मिलेगा।

जीवन में आराम मिलेगा।

यह दुनिया है;

सब होता है।


(९) 

यौवन में उज्जवल

बालों से।

मछुआरों के जालों से।

वन बबूल की डालों से।

और पशु चर्म की

खालों से।

होता है क्या मन

प्रसन्न!

यह दुनिया है;

सब होता है।


(१०)

                                                                     नीरसता सा;

उत्साहों का।

भयभीत कहीं;

निर्वेदित भी।

विस्मय सा होता हास्य

यहीं।

हो रति भाव का वास

यहीं।

यह दुनिया है;

सब होता है।


(११)

                                                             जब सीता जैसी नारी हो;

जो राम राज में रोई थीं।

जो स्वर्ण हिरण का मोह

लिए;

निज प्राणनाथ से रोई थीं।

इच्छा पूरण की इच्छा,

थी।

श्री राम गए थे, तब वन को।

लक्ष्मण ने जो रेखा खीची;

लक्ष्मण - रेखा वो पार

हुई।


                                                                 वह एक प्रयोजन ही

था।

जो था रावण वध का।

यह दुनिया है;

सब होता है।


सब रोते हैं।


(१२) 

पत्नी होती है दुनिया ही

निज,

 प्राण - पति की।

ज्वाला से परिचित होगी

तुम उस एक सती की।


                                                                     वह रावण था।

श्री राम प्रभु हैं, सीता भी हैं।

कोई और नहीं वो हरि ही है

और लक्ष्मी जी हैं।


वह शेषनाग हैं लक्ष्मण ही।


जागृत रहकर चौदह वर्षों

तक सेवा दी।

फिर गुणाकेश की पदवी

की।

यह दुनिया है;

सब होता है।


(१३)

                                                                     क्या ऐसे ही!

मिल जाती  है जिनको यूं हीं,

सम्पत्ति भी।

उनके हिस्से में अधिक में है,

विपत्ति ही।


कर्मों का जो बोध ज्ञान खो

बैठे हैं।

धर्मों का जो दान - पुण्य

खा बैठे हैं।

उनका भी होता है हिसाब,

किताबों में।

क्या सोचा है क्यों होता है?

कब होता है?

तब होता है।

जब होता है…

जब निशा गगन में छाती है।

फिर रात्रि काल हो जाता है।

फिर शयन क्रिया करने को वह;

जब शयन कक्ष में जाता

है।

फिर नेत्र सिथिल हो जाते हैं।

मखमल का बिस्तर होता है।

बस नींद नहीं वह आती है।

जो कामगीर को आती है।

 यह दुनिया है;

 सब होता है।


(१४) 

तुम भी कह दो जो

हो कहना।

बिंदी हो या फिर

हो गहना।

चुप क्यों हो

यह तो दुनिया है।

सब होता है।

तुम चुप क्यों हो!

जब तुम सजती हो गहनों

से।

मैं दबा अर्थ के वहनों से।

मेरी क्या स्थिति हुई है।

कह भी दूं तो तुमको क्या!

मैं व्यक्ति एक साधारण

सा।

हूं जन्मभूमि का तारण सा।

पर तुम तो हो प्रसारण सी।


तिरछी नज़रों से देखे जो।

मैं उस पर क्रोधित होता

हूं।

यह दुनिया है;

सब होता है।


(१५)

तेरा ना इसमें दोष प्रिये।

हैं कहीं कभी जो रोष

प्रिये;

उसका कारण नारी ही है!

ऐसा क्यों कहते रहते हैं!

तुम मेरे ग्रह की लक्ष्मी हो;

तुमसे हूं कुछ, मैं पूछ रहा

कुछ बोलो भी यह दुनिया

है;

सब होता है।

तुम चुप क्यों हो!


(१६)

तुम सुनने को तैयार तो

हो।

तुममें मेरे प्रति प्यार तो है।

तुम सुनने को सुन भी लोगे;

मैं कहने को तो कह दूंगी……


पर रखा क्या है कहने में।

कह दिया तभी था गहने

को।


सुनना है तुमको पुनः पुनः;

तो सुन लो फिर एक बार

पुनः।


लेनी मुझको वो बिंदी है;

लेने मुझको वो गहने हैं।


(१७)

इतने सारे है पास सभी

गहने ही है।

करता हूं मैं प्रयास;

 तुम्हें

यह विदित भी है।

यह दुनिया है;

सब होता है तो अर्पण

ही।

मेरा जीवन - तन - मन भी

 है तुमको अर्पण!


(१८) 

तुम इतना क्यों स्नेह

दिखाते रहते हो!

तुम अधिक में क्यों बस प्रेम

जताते रहते हो!

यह दुनिया है;

सब होता है।


अब तुम चुप हो!



क्यों?


(१९)

तुम लगा जो लेती हो बिंदी;

लगती तुम बिल्कुल देवी

हो।


           ये जो आकस्मिक रूप से कविता के अंत में वार्ता का दृश्य है और उसमें ये वह व्यक्ति जो किसी को संबोधित करते हुए गहने और बिंदी देने की बात कह रहा हैं वह रचनाकार की अर्थात मेरी स्वयं की अनुभूति है। जिसका न्याय संगत रूप से उपयुक्त काव्यात्मक शब्दों का प्रयोग करते हुए बखान किया गया है और यहां उस महान मानव के कर्मो को बताने का प्रयास किया है जिसका पूर्ण गद्यात्मक वर्णन आगे शेष पंक्तियों के बाद उपलब्ध है।


यह दुनिया है;

सब होते है।

मैं बोता हूं;

बोता रहता हूं।

यह हरित स्वर्ण मैं बढ़ा

रहा;

हे देवी यह तो उचित ही है।

मैं प्रेरित हूं बस तुमसे ही;

धरती पर बिंदी लगा रहा।

सुन्दर दिखती है यह बिंदी।

जब खिलती है मां यह तुम पर;

  मैं कहने को यह कह दूंगा।

यह जीवन तो परमार्थ ही

है।

मैं करने को भी कर दूंगा।

अर्पण यह जीवन तुझपर।

यह दुनिया है;

सब होता है।

सब दिखता है;

यह दुनिया है। 


(२०)

मेरा दुखता है हृदय यहां।

                                                                   यह दुनिया है;

तुम दुनिया हो।

सब होता है;

सब होते हैं।

निश्चित ही दूंगा मैं

तुमको।

ये बिंदी भी; ये गहने भी।

जीवन भर दूंगा बिंदी

भी;

जीवन भर दूंगा गहने

भी।


         इस काव्य खण्ड में लिखी अंतिम पंक्तियां जो श्रीमान जादव पायेंग जी के संदर्भ में है ये पंक्तियां उनके कार्यों को समर्पित हैं।


       ( जादव " मोलाई " पायेंग (जन्म 1963) एक पर्यावरणविद और जोरहाट के वानिकी कार्यकर्ता हैं, जिन्हें लोकप्रिय रूप से फ़ॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया के रूप में जाना जाता है । कई दशकों के दौरान, उन्होंने ब्रह्मपुत्र नदी के एक सैंडबार पर पेड़ लगाए और उन्हें जंगल में बदल दिया। इन्होंने अपनी मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति से केवल मिट्टी और कीचड़ से भरी जमीन को फिर से हरा-भरा कर दिया।

यह जंगल माजुली द्वीप पर स्थित है, और इसका नाम अब उनसे प्रेरित होकर मोलाई वन रख दिया गया है। यह जोरहाट, असम, भारत के कोकिलामुख के पास स्थित है और इसमें लगभग 1,360 एकड़ / 550 हेक्टेयर का क्षेत्र शामिल है । 2015 में, उन्हें भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म श्री से सम्मानित किया गया था। उनका जन्म असम के स्वदेशी मिसिंग जनजाति में हुआ था।)




 उक्त पंक्तियों के अंतिम चरण में श्रृंगार रस का नहीं अपितु वात्सल्य रस का प्रयोग कुछ इस प्रकार हुआ है कि यह बात सामान्य व्यक्ति की दृष्टि में तो यह पूर्णतः अनुपयुक्त होगी ही और सामान्य धारा के कवियों को भी न्यायोचित नहीं लगेगी। यदि कोई व्यक्ति या कवि विशेष  इस काव्य की आलोचना करना चाहे तो वह मेरे द्वारा पूर्णतः आमंत्रित है। 



              धन्यवाद !



         यह दुनिया है ; सब होता है। (खण्ड -१)

    

    कर्म - भाव 



         समाप्त!