यहाँ ज़िन्दगी की शोखियाँ

ख़त्म हो रही हैं

मेरी जान

और तुम उलझे हो 

मौसमों के फेर में ...

मुझे देखो न

मेरे मन में 

फूलती है सरसों

साँसे हो जाती हैं

बासन्ती बयार

और

मेरी देह दहक-दहक जाती है

सुर्ख़ पलाश की तरह

पतझड़ में भी

तुम्हारे छूने से...





     ~अनिता सभरवाल