ज़िंदगी की तपिश भरी दोपहर में

किताब-ए-उम्र की हमने हटाई धूल


गुनगुना उठीं कुछ खट्टी मीठी यादें

मुस्कराए मोरपंख और फूल


कुछ कोरे पन्ने भी मिले यहाँ, तो

दिल ने हौले से मुस्कराकर कहा


क्यों न इक नई इबारत लिखी जाए

इन पर 

सुरमई शाम ढलने से पहले.....


अनिता सभरवाल