मुझे बस्स 'तुम' चाहिए

सिर्फ़ तुम!

जो झील बन गए हो धीरे धीरे मेरे भीतर...

आकाश का सारा फ़ैलाव

उगते और डूबते सूरज के तमाम रंग

हवाओं की शोखियाँ

ठहरे पानी की सतह पर

उठती अनगिनत लहरों की खिलखिलाहट

सब तुम हो अब मेरे लिए...

तुम्हें नहीं मालूम

कि साँझ होते ही

मैं छिप जाती हूँ 

इसी झील में सोन मछरी की तरह

और फिर शुरू होती है 

वह स्वप्न यात्रा

जो मुझे दिग दिगांत 

के भी पार पहुँचा देती है

 तुम तक...

 जानते हैं स्वप्न भी कि मुझे 

 'तुम' चाहिए बस्स....




अनिता सभरवाल