कभी तुम भी देखो न

तप्त, सिंदूरी साँझ को

सुरमई होते हुए...


और...


नर्म मख़मली अँधेरों को

उस पर छा जाते हुए...

धीरे...धीरे...धीरे...

अनिता सभरवाल