अबीर गुलाल संग लिए, पिचकारी भर उमंग लिए
फ़ागुन ने पग धरा,भंग की तरंग लिए।
सतरंगी चेहरे हुए, मन बहक-बहक जाए
चूड़ी कहीं बज उठे, कहीं पायल गीत गाए।
लाल रंग उड़ा कहीं, कहीं चेहरे धानी हुए
रंग कभी गीत बने, कहीं नेह की कहानी हुए।
रंगों की फुहार ने भिगो दिया तन-मन
इंद्रधनुष धरती पर पग रखे संभल-संभल।
जागी-जागी रातें हुईं, दिन हुए अलसाए
मौसम की सरगम ने प्यार के गीत गाए।
सूरजमुखी हुआ फ़ागुन, कभी हरसिंगार है,
मोरपंखी बने कभी, कहीं पलाश रतनार है।
रंगीन हुए गोरी के सपने, मान मनुहार हुआ
कान्हा की नगरी में फिर अभिसार हुआ।
~अनिता सभरवाल


