घने पेड़ों के साए तले

जंगल में इक ख्वाब बुना था

लम्हों के पत्ते तोड़े थे

इश्क़ का लिबास सिला था


सुर्ख़ सूरज ने जाते-जाते

बादल से धूप को छाना था

पल भर में ही चाँद ने आकर

शाख़ों पे डेरा डाला था।


सोंधी-सोंधी खुश्बू से

महकी सारी क़ायनात थी

अब तक न भूले हम उसको

कैसी बला की रात थी