शुरुआत कृष्णा सोबती के ही लफ़्जों सेः

'जो मिल गया सो मुबारक,जो बिछुड़ा सो रुखसत. ऐसे में आप भावनात्मक जमाखोरियों से दूर रहते हैं. किस्सा कोताह यह है कि क़ीमत की अदायगी हमेशा आपके अपने सिर. ऐसे में आप अपने दिल-बहलाव और चुहल दूसरों के सिर पर नही छोड़ते... लेखक होने के नाते सिर्फ़ दूसरों की तस्वीरों और चौखटों को अपने हाथ से ज़ख्मी न करने की एक छोटी सी कसम खा रखी है.'

हम में से कितनों ने खाई है ऎसी कसम? 

साथ ही, 'न किसी की हुकूमत न किसी की गुलामी...खुद ही मालिक और खुद ही मातहत...ऐसे में दुनिया और उसकी वास्तविकता की पहचान, आप किन्हीं दीवारों दरवाज़ों की ओट से नहीं करते...'

तो क्या इसीलिए उनके सारे किरदार असली लगते हैं?

ये हैं कृष्णा सोबती… ... (उन्हें ‘थीं’ कहना मुझे आज भी अजीब लगता है). बिना किसी लाग-लपेट के बात करती हुईं. उनसे मिलने और बात करते हुए मुझे कभी लगता कि इन्होंने ही लिखे है वे सारे उपन्यास जो हम पढ़ते आए हैं और अचानक ही महसूस होता है 'न, नहीं, बिल्कुल नहीं. ये नहीं हो सकतीं.  

कृष्णा सोबती के व्यक्तित्व या लेखन के बारे में लिखना मेरे लिए बहुत मुश्किल ही नहीं नामुमकिन-सा लग रहा है. उन्हें जानने का दावा मैं नहीं करती. न ही मैं खुद को इतना क़ाबिल मानती हूँ कि उनके लेखन के बारे में राय दे देने की गुस्ताख़ी करूं. हाँ, इस लिखे हुए में सारी बातें, अनुभव मेरे अपने ही हैं. ये तारीफ़ें उधार की नहीं हैं. क्या सच में किसी के बारे में हम इतना जानते होते हैं कि कभी भी 'कुछ' भी लिख दें? वह भी कृष्णा जी को, जिन्हें बहुत कम लोग व्यक्त्तिगत तौर से जानते हों. जो कुछ कहती-बतातीं ही नहीं अपने बारे में. जो पता लगाना है बस उनकी मुस्कान से लगा लीजिए या उनकी खरी-खरी बातों से. या फ़िर उनकी गर्वीली-रौबीली या नर्म-मिजाज़ नायिकाओं का मन पढ़कर. एक रोज़ कहा था उन्होंने, 'न कोई दोस्त है न दुश्मन-मेरे साथ हमेशा ऎसा ही रहा है' मैंने कहा,'दुश्मन तो वाकई आपका कोई नहीं है और दोस्त आपने बनने ही न दिए होंगे, वरना बाढ़ ही आ जाती आपके घर में दोस्तों की' और हँस दीं वे. 

जब हशमत का कोई दोस्त-दुश्मन है ही नहीं तो उनके बारे में जाने कैसे कोई? 

सो खुद को ही अपने हर अच्छे-बुरे के लिए जिम्मेदार ठहराती हुईं, कृष्णा सोबती ने ज़िन्दगी के कितने ही मौसम देखे. हर रिश्ते का स्याह-सफ़ेद उनसे वाकिफ़ था. इतने रिश्तों का कोई रंग तो कहीं छूटा होगा उनसे? या इतने मौसमों का कोई रूप? पूछने पर कहा था मुझसे, ' लड़की, जब सफ़र बहुत लम्बा हो जाता है न तो...काफ़ी कुछ रह जाता है, काफ़ी कुछ....विस्तार भी पाता है...इसी को ज़िन्दगी के झमेले कहते हैं. तुम्हें भी अपने जैसा पाती हूँ मैं. महसूस करोगी तुम भी.’

मैं? उन जैसी? नामुमकिन. पर यह बात मेरे सर चढ़कर बोलती रही थी एक अरसे तक. 

खुशकिस्मत हूँ मैं कि मुझे उनसे एक-दो बार नहीं अनेक बार मिलने का मौक़ा मिला. मैं सिर्फ़ उन्हें मिलने ही दिल्ली जाती थी. रात भर बातें करते थे हम.

कृष्णा जी से मिलने से पहले मैं उन्हें उतना ही जानती थी जितना एक पाठक अपने प्रिय लेखक को उसकी कथा-किताबों के हवाले से जानता है या जान सकता है। बहुत पहले ही मैं उनकी लगभग सारी किताबें पढ़ चुकी थी और घोर प्रशंसक बन चुकी थी. उनसे मिलने से पहले, उनके व्यक्तित्व के कई सारे पहलुओं को मैंने कथाकार सत्येन कुमार से जाना. वह उनके बारे में इतना कुछ बताते थे कि मुझे लगने लगा कि मैं उन्हें अच्छी तरह जानती हूँ. सत्येन जी से मिली जानकारी को मैंने बड़ी बेशर्मी से अपना माना और दो-चार मौकों पर उनका ज़िक्र भी कर डाला था...(माफ़ी चाहूंगी.)

मुझे तो कथा-कहानियों का विश्लेषण करने का सलीका नहीं है. जो मन को छूता है वही तो अच्छा लगता है. जिनके पात्रों के साथ-साथ मैं अपनापन महसूस करते हुए मैं‌ आखिर तक चलती हूँ. खुद एक पात्र बन जाती हूँ कुछ देर के लिए..उनके साथ रोती हूँ. उनकी खुशी में खुश होती हूँ. इसे ही मैं अच्छा कहती हूँ. उनकी भाषा अपनी-सी लगती है, जानी-पहचानी-सी... बस....यह अपनापन ही उन्हें खास बनाता है. ज़िंदगी के सच चुनती हैं वे. और नहीं पता मुझे. मित्रो मरजानी की तल्खियाँ, शिकायतें हों या सूरजमुखी अंधेरे की नर्म-नाज़ुक बर्फ़ीर्ली उदासियाँ. बादलों के गहरे अंधेरे की रौशनियाँ हों या डार से बिछुड़ी की डरी-सहमी आँसुओं से भीगी इधर-उधर डोलती हवाएँ. कितनी ही बार पढ़ चुकी हूँ उन्हें. उनकी हर रचना का अलग करैक्टर है. कहीं नर्म तो कहीं गर्म. गुस्सा, प्यार, दोस्तियाँ सब है यहाँ...

हम कह सकते हैं कि उनका लेखन उन्हीं‌ की तरह एलीगैंट, बुलंद, स्वाभिमानी और जिद्दी भी है.

यानि कि 'हम तो यही लिखेंगे और आप न चाहते हुए भी पसंद तो करेंगे ही.'

खैर, ये बातें आलोचकों और समीक्षकों के हवाले.

कृष्णा जी से पहली बार मैं भोपाल में सत्येन कुमार के घर पर मिली थी. बहुत उत्सुकता, खुशी तो थी ही. अजीब-सी फ़ीलिंग थी. बेवकूफ़ी देखिए मेरी ज़रा. मैं तो यह ही तय नहीं‌ कर पा रही थी कि पहनूँ क्या? तो उस शाम मुझे तो लग रहा था कि वे मुझ से ही मुखातिब रहेंगी और सवाल करेंगी. अगर उन्होंने कुछ पूछ लिया तो मैं‌ क्या कहुँगी... 

यही तो होते हैं मुग़ालते. 

बहरहाल वह मुलाकात लेखन और लेखक की दुनिया से एकदम अलग थी. बहुत सहजता थीं उनके बर्ताव में. खूब हँसी- ठहाके लगे. बहुत-सी पुरानी बातें बताती रहीं. सबने कुछ पूछा-सबने कुछ बताया भी. किसी की नक़ल करके भी बताया था उन्होंने. हाथ में ग्लास लिए, हँसते हुए. मैंने बरसों उन्हें ऐसा ही देखा. न किसी की आलोचना, न बुराई, हँसी ठहाके, दिलदार और दमदार बातें... बेबाक बातें.  

मैं उनसे अभिभूत थी. उनकी पोशाक से तो मेरी नज़रें ही नहीं हट रहीं थीं. उनका शानदार, रौबदार व्यक्तित्व, बेबाक़ हँसी, प्यारी-सी मुस्कराहट जो शरारती-सी भी थी, हम सब प्रभावित हो गए थे. उनकी आवाज़ में कुछ खास था मेरे मुंह से बेसाख्ता ही निकल गया था, 'यह होती है आवाज़, क्या ख़नक है!' वे प्यार से देखती रही थीं.

रात के साढ़े बारह बज चुके थे लेकिन एनर्जी से भरपूर थीं वह... तरोताज़ा. थकान का नामोनिशान नहीं था चेहरे पर. पता चला कि उनका लिखना रात ही में होता है..अल्लसुबह सोती हैं वे.

हम लोग अकसर फोन पर बात करने लगे थे. लेखन के बारे में बात करने की मेरी न तो हिम्मत थी और उनके सामने औक़ात भी नहीं. मेरे पास पहला सवाल उनका हाल-चाल और स्वास्थ्य पूछने का होता था. दूसरा- क्या लिख रही हैं आप आजकल और फ़िर उनकी आवाज़, पोशाक लेखन की तारीफ़ें. उनकी स्टाइलिश पोशाक के तो क्या कहने! वे खूब अच्छी बातें कहतीं,जिन्हें मैं संभाल कर रख लेती और आज भी मन ही मन कई बार दोहरा लेती हूँ.

एक बार उन्होंने कहा, 'अनिता. अपना नाप भेज दो. मैं ड्रैस सिलवाकर भेज दूँगी. खुद अपनी पसन्द से.'

सच कहूँ ,मन हुआ कि हाँ कह दूँ पर फॉर्मैलिटी हो ही गई, 'नहीं-नहीं आप डिज़ाईन बता दें. लिखकर भेज दें. कैसे कितना कपड़ा लगेगा, मैं बनवा लूँगी.'

'अरे नहीं, तुम नाप भेज दो. लड़की, बड़ों का कहना मानते हैं.’ इतना प्यारा आग्रह.

'जानती हो यह ड्रैस मैंने चालीस-पचास साल पहले खुद डिज़ाईन की थी. सोचो, अगर आज मैं यही कर रही होती तो?' और वे जोर से हँस दी.

मैंने भी हँसते हुए कहा, 'अगर आप ड्रैस-डिज़ाईनर होतीं तो आपके कई बुटीक होते और मेरे जैसे जाने कितनी ही  क्लाइंट्स क़तार में होते-और होतीं तब भी आप कृष्णा सोबती ही. क्योंकि होना आपको इसी पायदान पर था.' 

   ‘तुम कुछ ज्यादा ही तारीफ़ नहीं करतीं मेरी?’ वे हँसते हुए कहतीं.

एक मुलाकात हुई थी भारत भवन, भोपाल में. वे कहानी पाठ के लिए आमंत्रित थी. उस दिन मैंने पहली बार वहाँ इतनी भीड़ देखी थी. यह मिलना पहली मुलाकात से अलहदा था. बेहद संतुलित और ग्रेसफुल दिख रहीं थीं वे. चेहरे पर वही उजली, खिली-सी मुस्कान. मुझे याद है, धीरे-धीरे नज़ाकत से चलती हुई स्टेज पर पहुँची थी वे. भारत भवन के उस कक्ष 'अंतरंग' में वाकई पिन-ड़ॉप शांति थी. एक उत्सुकता भी थी. जो पहली बार उनके कहानी-पाठ से रूबरू होने जा रहे थे उनमें भी और बाकी लोगों में भी. उनका हाथ पकड़ा था‌ उस दिन मैंने. स्टेज तक जाने के लिए. कितने नर्म-नाज़ुक हाथ. क्या यही नर्मी. ‘सूरजमुखी अँधेरे के’ में उतर आई थी? या ‘डार से बिछड़ी’ में?

यही नर्मी जिद्दी पात्र बनाती है? हर किताब के पात्र दूसरे से भिन्न, इतने भिन्न? इतनी बारीकियाँ? 

महिला पात्रों को वह एक खास तरीके से प्रोजेक्ट करती हैं. कागज़ पर उतरा वह पात्र इतना जीवंत हो उठता है कि लगता है अपने सारे राज़ हमारे कानों में ही कह रहा है...पढ़ ही नहीं रहे हम कहानी, न सिर्फ़ महसूस ही कर रहे हैं, हम उसे सुन भी रहे हैं.

ज़ाहिर है यह सब देखा है, जिया है उन्होंने. अपने आस-पास के लोगों को पात्रों का जीवन दिया है उन्होंने. इसीलिए ऎसा महसूस करते हैं हम. 

एक मुलाकात, श्यामला हिल्स, अंसल अपार्टमैंटस भोपाल में उनके फ्लैट पर. बड़े शौक़ से यह फ्लैट खरीदा था उन्होंने. लेकिन वह फ्लैट और भोपाल दोनों ही उन्हें रास नहीं आए. वे जल्दी ही दिल्ली लौट गईं.

उन्होंने कहा कि वह फ्लैट बेचना चाहती हैं. मुझे बड़ा दुख हुआ सुनकर, लेकिन क्या कहती? फिर भी कहा, ‘बेचिए नहीं, आप कभी तो आएँगी...'

‘नहीं अनिता, अब नहीं आ पाऊँगी. इस उम्र में सफ़र भी नहीं होता और वहाँ मन भी नहीं लगता. भोपाल में सब कुछ बहुत बदल गया है.'  

बदल तो वाकई बहुत कुछ गया था. 

'मेरी स्टडी टेबल और जो कुछ चाहिए तुम ले लेना.'

कृष्णा जी की स्टडी टेबल आज भी मेरे पास है. यह मेरे लिए अमूल्य तोहफ़ा है! 

मेरे परिवार को दिए गए ढेरों तोहफों के अलावा मेरे पास एक प्रिय चीज़ और है... सर सैयद हैदर रज़ा की एक नायाब पेंटिंग.

‘एक और देनी है, पिकासो की...’

‘तो दीजिए न?’मैंने कहा.

‘इसके लिए एक बार फिर आना होगा...’

मैं गई भी..लेकिन अस्पताल में उन्हें देखने भर के लिए.


ज़िंदगी के बेहद उतार-चढ़ाव के बाद हम भी देहरादून आ गए.  

यहाँ आने के बाद मेरी उनसे बातचीत ज़्यादा होने लगी. वह राजनीति और बढ़्ते हुए भ्रष्टाचार को लेकर चिंतित रहती थीं. सजग लेखक होने के नाते भी और एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते भी. उनके विचार इन मुद्दों को लेकर बेहद स्पष्ट और लॉजिकल होते थे. घुमा-फिरा कर नहीं कहतीं थीं कुछ. किसीकी भी बुराई वह नहीं, बस शिकायत-सी होती थी उन्हें, तकलीफ़ होती थी वह भी बिगड़ते हालात से. उन्हें दुःख था कि उनके देखते-देखते बढ़ती जा रही थीं बुराईयाँ.

वे अकसर बीमार रहने लगी थीं. मैं शिकायत करती थी कि मुझे नहीं बताती थीं. ‘आपको जब भी ज़रूरत हो कहिएगा. एक बार कहेंगी न तो अगले दिन हम वहाँ होंगे.’ मैं यही कहती थी. जानते हैं क्या जवाब दिया उन्होंने, 'मेरे लिए यह कितनी बड़ी बात है कि कोई तो है, जिसे मैं आवाज़ दूँगी और वह पहुँच जाएगा.'

उनसे बातें करके मेरा मन हल्का हो जाता था. उनकी शख्सियत में एक खास बात यह थी कि वह बड़े धीरज से और पूरी बात सुनती थीं और बहुत अच्छी तरह जवाब देती थीं. हाँ, उनकी आवाज़ में बच्चों की तरह एक उत्सुकता थी. हर बात के जवाब में 'हाँ जी'- सामने वाला चाहे उम्र में छोटा हो या बड़ा। हर सवाल पर उत्सुक-सा 'अच्छा?'

दोस्त वह बनाएँ या न बनाएँ,अतीत को भले न याद करें लेकिन वर्तमान के रिश्ते वे खूब निभाती थीं. उनकी चिंताएँ मेरे लिए वही थीं जो एक बड़े, फ़िक्रमंद शख्स में होती हैं, अपनों के लिए.  

जून 2013 में उत्तराखंड में बारिश ने कहर ही ढा दिया था. उन्होंने फिक्रमन्द आवाज़ में फ़ोन किया, 'वहाँ ठीक है सब, देहरादून में तो बाढ़ नहीं? मुझे तुम लोगों की बहुत फ़िक्र हो रही है.'

मैंने बताया कि यहाँ ऐसी दिक्कत नहीं है. मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि हम सुरक्षित हैं 'पर बाकी हालात दिल दहलाने वाले हैं। यहाँ से कहीं भी आना-जाना नामुमकिन है.’ 

‘देखो, ज़रा भी दिक्कत हो तो कुछ सामान उठाओ और यहाँ मेरे पास चले आओ.'

मेरी आँखें भर आई. चुप-सी रह गई. सोच रही थी मुझे ऐसा कहने वाले कितने लोग हैं अब मेरी ज़िंदगी में? मैं रो पड़ी. कितना घबरा गई थीं वे. कुछ पल के बाद कहा मैंने, 'मेरी ममा नहीं रहीं.'

 पल भर की खामोशी के बाद पूछ उन्होंने,

'कब?'

'अभी कुछ ही दिन पहले..'  

खामोशी रही उधर. ऐसे में किसीके लिए कुछ भी कहना अज़ीब सा हो जाता है.

'जब मैं उनके पास थी कुछ दिन पहले तो पता है वे कैसे बिहेव कर रही थीं? 'ऎ लड़की' की माँ की तरह... वे अतीत में चली गई थीं. अपने बचपन में शायद...वैसी ही बातें, बिल्कुल वैसी, जो आपने लिखी हैं. क्या सारी औरतों का मन एक-सा होता है? उनकी यादें भी और लफ़्ज़ भी?'

वे सुनती रहीं. फिर पूछा, ‘क्या नाम था उनका? क्या उम्र थी?’

इसी दौरान मैंने जाना कि हर बॆटी मॆं उसकी माँ और हर माँ में उसकी बेटी होती है. बेटी में माँ खुद को देखती रहती है, तलाशती रहती है उम्र भर और माँ बनने पर बेटी खुद में अपनी माँ को पाती है.

कृष्णा जी की विल पॉवर का कोई मुकाबला नहीं था. इस सोपान पर खड़ी कृष्णा सोबती को मैंने उनकी बीमारी में भी कभी निराश नहीं पाया. कभी नहीं सुना उनकी तकलीफ़ों का वर्णन. हम लोग अक्सर एक दूसरे को अपनी कोई न कोई समस्या, शारीरिक या मानसिक बता ही देते हैं पर वे? बिल्कुल नहीं. शायद इसीलिए क्योंकि 'न कोई दोस्त है न ही दुश्मन और सारी शिकायतें अपने ही सिर.'

कभी पूछ लेती ,'और क्या कर रही हो आजकल?'

'कुछ नहीं. कुछ लिखा ही नहीं जा रहा जबकि इतना वक्त है मेरे पास. पर वक्त और लिखने का कोई ताल्लुक नहीं होता न?'

'बिल्कुल नहीं होता. है तो बहुत कुछ लिखने... कितना कुछ हो रहा है हमारे आस-पास...देश में, समाज में, हर फ़ील्ड मॆं, कितने विचार हैं पर उन्हें लिख ही नहीं पा रहे हैं. कितना बदलाव आ रहा है. हमारा मन, दिमाग इन समस्याओं, सवालों में उलझ गया है थॉटस जम से गए हैं, यही वजह है न लिख पाने की.’

पर शर्मिंदगी तो तब होती थी जब वे बताती थीं कि वे कुछ लिख रही हैं. रोज़ कुछ नया कर रही हैं. नया तलाश रही हैं पर वे तसल्ली देतीं, 'कोई बात नहीं अक्सर होता है ऐसा, यू आर अ' गुड राईटर.’ जानती हूँ तसल्लियाँ ऐसे ही दी जाती हैं. पर मैं खुश हो जाती थी. उनसे पॉज़ीटिव एनर्जी मिलती थी. हर बार बात होने के बाद उनकी कोई न कोई किताब पलटती थी, पता नहीं क्यों? बातों और लेखन में कोई रिश्ता तलाशती थी या यह सोचती थी कि ये हैं वो महान लेखक जिससे मैंने बात की है अभी? 

आज के लेखकों से प्रसन्न थीं वह. संतुष्ट थीं उनके लेखन से, उनकी लगन से. उनकी प्रशंसा करती हुई कृष्णा जी ने कहा था , ‘हम उनसे बहुत कुछ सीख रहे हैं. उनके पास सुविधाएँ हैं तो समस्याएँ भी हैं फिर भी अच्छा लिख रहे हैं. बहुत कुछ हम नहीं कर पाए जो आज की पीढ़ी कर रही है.'  

तो यह हैं सीधी-सरल बातें करने वाली असली कृष्णा सोबती?

हशमत भी ये ही हैं? 

मित्रो मरजानी की तुनक मिजाज़ी में इनका हाथ? (और हो भी किसका सकता है?)

ऐ लड़्की की माँ-बेटी के रिश्ते को उंचाईयाँ इन्होंने ही दीं?

डार से बिछड़ी, इधर-उधर भटकती मासूम पाशो के तन-मन के दुख-दर्द को गहराईयाँ किसने दीं?  

कई बार सोचती थी कि इतना अलग और इतना अच्छा कैसे लिख पाती हैं वह. इसका जवाब उन्होंने तो नहीं दिया पर 'सोबती एक सोहबत' ने ज़रूर दिया। मैंने कई बार इन लाईनों को पढ़ा है जो बयाँ करती हैं कृष्णा सोबती के रचना संसार को. भले ही यह उन्होंने अपने उपन्यास 'ज़िंदगीनामा' के बारे में कहा हो लेकिन उनकी लेखन प्रक्रिया का सच यही है--

'ज़िन्दगीनामा को हाथ से लिखना भर नहीं था. उसे तो ज़िन्दगी की तरह ही जीना था. खेत में फ़सल की तरह ही उगाना था. हुआ यह कि ज़मीन के एक सोंधे टुकड़े पर आँख टिक गई. हक़ तो था ही. कुछ चाहत थी. कुछ विरासत. बस खेत ले लिया. हदबंदी की. ज़मीन हमवार की. मिट्टी की किस्म देखी. सिंचाई की थाह मापी. बीज भरा. मौसम देख बोआई शुरू कर दी. बीच में जो है गुज़रा, वह खेतिहर का मेहनत मुकद्दर और कुदरत की बरकत-बख्शीश. बाक़ी फसल सामने है. अगर सूखी है तो धरती और बीज की कमी है तो वह अपनी छोटी तौफ़ीक की.'

यह पढ़ा तो सोचती रही, 'जो शख्सियत इस शिद्दत से लिखने की ज़मीन तैयार करती है, तो लिखने के अच्छे मौसम कैसे बिना बरसे गुज़र जाएँगे वहाँ से लिखने के बाद इस खूबसूरती से सब बयाँ करती है उसके बारे में लिखना आसान है क्या?'

बिल्कुल भी नहीं.

बड़ी सादगी से आप कहती हैं, 'दोस्तों मैं वही हूँ जो आप हैं. क़तार दर क़तार देखते जाइए- हम सब एक से ही दिखेंगे.'

...नहीं, कृष्णा जी, मुझे ऐसा नहीं लगता...क़तार में, भीड़ में, हर जगह आप सबसे जुदा हैं...और आपको हम इसी तरह पसंद करते हैं....


अनिता सभरवाल