हम गर जुदा भी हो जाएँ
तो दरिया के साहिल हो जाएँ
तुमको छूकर जो लहरें आएँ
वो हमको भी सहला जाएँ।
ख़ामोश हो पानी तो समझेंगे
घेरे हैं तुम्हें उदासी के साए
लहरों की मदहोश रवानी से
जानेंगे कि तुम मुस्काए।
भीगेंगे, ठिठुरेंगे इक दरिया में
इक ही पानी साँसे महकाए
देखेंगे समंदर के सीने पर
इक आसमाँ के नीले साए।
चाँद छुएगा जब लहरों को
संग उनके हम भी मचल जाएँ
सूरज कर देगा हमें सिंदूरी
बारिशों में मिलकर आँसू बहाएँ
उस पार से जो किश्ती आए
इस पार हमको बस्स छू जाए
समझेंगें तुमको पा ही लिया
खुदाया ऐसा कर्म हो जाए।
✍️अनिता सभरवाल


