इक मौसम में जब
बर्फ़ पिघलती है तो
कहाँ जाती है...
वह हो जाती है नदी,
हर बार की तरह....
बिना पंख-पैर के उतरती है
पहाड़ों से
अपना पूरा जिस्म लिए
बहती है...
बस बहती रहती है
और
लग जाती है समंदर के गले
प्रेम-पगी स्त्री की तरह...


इक मौसम में जब
बर्फ़ पिघलती है तो
कहाँ जाती है...
वह हो जाती है नदी,
हर बार की तरह....
बिना पंख-पैर के उतरती है
पहाड़ों से
अपना पूरा जिस्म लिए
बहती है...
बस बहती रहती है
और
लग जाती है समंदर के गले
प्रेम-पगी स्त्री की तरह...