मुझ को मुसलसल यही फ़क़त लगता रहा
निगाहों के दरमियां हमारी कुछ चलता रहा
मिलेंगे किनारे आगे किसी मोड़ पर
दरिया बस इसी तसव्वुुर मे बहता रहा
तुमने ख़ामोशी से सुलह कर ली चाँद से
और मै बे-वजह सितारों से लड़ता रहा
तुम हिज़्र पर नाज़ कर होती रही दूर
मै खामखाँ वस्ल के पैर पकड़ता रहा
आसन होता मेरा खुद से मुहब्बत करना
मै ता-उम्र तुम से मुहब्बत करता रहा
मुख़्तलिफ़ थे ज़हन मे ख्वाब उनके कई
मै यूहीं मनमुताबिक़ ताबीरें पढ़ता रहा
