तूझे सुनना नही था, सो मैने कहा भी नही
बात निकली ही नही, तो कोई मरा भी नही
अजीब सा शख्स था मेरे घर मे आ कर बैठ गया
मेरा हुआ भी नही जो, ग़ैर बना भी नही
मुहब्बत एहसास-ए-मसर्रत की इन्तिहा है बेशक
मगर उश्शाक़ से ज्यादा कोई ग़म-ज़दा भी नही
मौत के सिवा और देता भी क्या बदले वफ़ा के
जीतेजी इस से ऊपर तो कोई सज़ा भी नही


