सफर इतना कठिन नहीं था, जितना मान लिया मैंने,

किसी अभावी शत्रु हेतु, करता रहा हथियार पैने |

साथी बनाया मोह, छल और स्वार्थ को,

सदा विपरीत समझा,जीवन के यथार्थ को ।

कुछ इच्छाएं कीं पूरी, तोड़ कितनो के सपनो को,

जीता हूँ मैं हरा कर, जाने कितने अपनों को ।

खेल के मैदान को, युद्ध का जान लिया मैंने !

सफर इतना कठिन नहीं था, जितना मान लिया मैंने ।


लक्ष्य पर पहुंचा, तब अहसाह पाया था,

मंज़िल ही वही थे, जो रास्ते छोड़ आया था !

उन्माद वह सफलता की शिखा का ,

अब जाना, छल था, केवल एक मरीचिका का ।

क्या करे कोई इस वैभव, इस धन का,

व्यर्थ है सब, जब हारा खेल मन का ।

सुख के लिए था, शांति का बलिदान किया मैंने,

सफर इतना कठिन नहीं था, जितना मान लिया मैंने ।


कई गर्व करते थे मुझपे, मै आईने से घबराता था,

एक लुटे से व्यक्ति को, प्रतिबिम्ब मे पाता था ।

यूँ तो मित्र हैं मेरे और परिजन आदि भी,

चाकर आते सेवा करने, जो चुटकी एक बजा दी भी ।

पर दुःख न बांटता मेरा कोई, चाहे जितनी आवाज़ लगा दी भी,

किसे दोष दूँ ? किसे सजा दूँ ? कोई नहीं अपराधी भी !

मै खुद अपना मुज़रिम हूँ, यह सच जान लिया मैंने,

सफर इतना कठिन नहीं था, जितना मान लिया मैंने ।


अब शीतल है मन मेरा, नहीं दुःख जतलाता हूँ,

दया कर खुद पर खुदसे ,नहीं मै ढोंग रचाता हूँ ।

खोया था खुदको मैंने, कुछ पाने की अभिलाषा मे,

ठान लिया अब नहीं फसूंगा, इस अनंत पिपासा मे ।

त्याग चुका लाचारी मै, मोह था जो चंचल मन मे,

हरी कीर्तन को बैठा हूँ, अब ईश्वर के प्रांगण मे ।

उसकी भक्ति मे ही खोकर, खुद को पहचान लिया मैंने,

सफर इतना कठिन नहीं था जितना मान लिया मैंने ।