दे कारावास हमें, निकली है प्रकृति फिर सैर को,

सुनो चहकना हर पक्षी का , देखो हर जंतु के थिरकते पैर को

नदियां फिर से इठलाती है, वृक्ष फिर मुस्काते है

बड़ दिनों के बाद, अपनी माँ को करीब पाते है

विपदा होगी मनुष्य पर यह, पर औरों पर वरदान है

क्यों भूल जाते है हम, केवल हम ही नहीं इस प्रकृति की संतान है ?