Video Link: https://youtu.be/0b4svBNJKVY
मैं मज़दूर हूँ
मै मज़दूर हूँ
कुछ नहीं बल्कि काफ़ी हक़ों से दूर हूँ
एक दिन भी छुट्टी की सोचूँ तो रात की दो रोटियाँ धुंधली नज़र आती है
पर आज हर दिन छुट्टी लेने को मजबूर हूँ
सड़कों पे हूँ, क्योंकि निकाल दिया है नौकरशाहों ने
पर पुलिस की लाठी मुझे मिलेगी, क्योंकि मै ही क्रूर हूँ
मै मज़दूर हूँ
कुछ नहीं बल्कि काफ़ी हक़ों से दूर हूँ
रस्ते पे चलता मूर्ख भी मै हूँ, समाज का दुश्मन भी मै हूँ,
चारों तरफ़ जिसकी चर्चा है, शायद वो संक्रमण भी मै हूँ
गलती क्या है मेरी, कि बस अपने घर पहुँचना चाहता हूँ
और क्यूँ ना पहुँचूँ, मेरे बच्चों का तो बचपन भी मैं हूँ
तुम्हारी हर इमारत की मिट्टी में मेरी मेहनत का पसीना है
आज अपनी मिट्टी तक पहुँचने कि लिए, फिर पसीना बहाने को मजबूर हूँ,
क्योंकि मैं मज़दूर हूँ
कुछ नहीं बल्कि काफ़ी हक़ों से दूर हूँ!!


