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रात अजब आसेब-ज़दा सा मौसम था

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रात अजब आसेब-ज़दा सा मौसम था

अपना होना और होना मुबहम था

एक गुल-ए-तन्हाई था जो हमदम था

ख़ार ग़ुबार का सरमाया भी कम कम था

आँख से कट कट जाते थे सारे मंज़र

रात से रंग-ए-दीदा-ए-हैराँ बरहम था

जिस आलम को हू का आलम कहते हैं

वो आलम था और वो आलम पैहम था

ख़ार ख़मीदा-सर थे बगूले बे-आवाज़

सहरा में भी आज कसी का मातम था

रौशनियाँ अतराफ़ में 'ज़ेहरा' रौशन थीं

आईने में अक्स ही तेरा मद्धम था

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Sootradhar