मुहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी है

Wasim BarelviWasim Barelvi8 Feb 1940

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तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते
इसीलिए तो तुम्हें हम नज़र नहीं आते

मुहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी है
ये रूठ जाएँ तो फिर लौटकर नहीं आते

जिन्हें सलीका है तहज़ीब-ए-ग़म समझने का
उन्हीं के रोने में आँसू नज़र नहीं आते

ख़ुशी की आँख में आँसू की भी जगह रखना
बुरे ज़माने कभी पूछकर नहीं आते

बिसाते -इश्क पे बढ़ना किसे नहीं आता
यह और बात कि बचने के घर नहीं आते

'वसीम' जहन बनाते हैं तो वही अख़बार
जो ले के एक भी अच्छी ख़बर नहीं आते

Wasim Barelvi
About the poet

Wasim Barelvi

Zahid Hussain (born 8 February 1940), better known by the pen name Wasim Barelvi, is an eminent Indian Urdu language poet. He was born in Bareilly, Uttar Pradesh. His ghazals, many sung by Jagjit Singh, are very popular. He has been awarded with the "Firaq Go…

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