जरा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है

Wasim BarelviWasim Barelvi8 Feb 1940

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जरा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है,
समंदरो ही के लहजे में बात करता है।

खुली छतों के दियें कब के बुझ गये होते,
कोई तो है जो हवाओं के पर कतरता है।

शराफ़तों की यहाँ कोई अहमियत ही नहीं,
किसी का कुछ न बिगाड़ो तो कौन डरता है।

ये देखना है कि सहरा भी है समुंदर भी,
वो मेरी तिश्ना-लबी किस के नाम करता है।

तुम आ गए हो तो कुछ चाँदनी सी बातें हों,
ज़मीं पे चाँद कहाँ रोज़ रोज़ उतरता है।

जमीं की कैसी वकालत हो फिर नहीं चलती,
जब आसमाँ से कोई फैसला उतरता है।

Wasim Barelvi
About the poet

Wasim Barelvi

Zahid Hussain (born 8 February 1940), better known by the pen name Wasim Barelvi, is an eminent Indian Urdu language poet. He was born in Bareilly, Uttar Pradesh. His ghazals, many sung by Jagjit Singh, are very popular. He has been awarded with the "Firaq Go…

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