मैं हरि, पतित पावन सुने।
मैं पतित, तुम पतित-पावन, दोउ बानक बने॥
ब्याध गनिक अगज अजामिल, साखि निगमनि भने।
और अधम अनेक तारे, जात कापै गने॥
जानि नाम अजानि लीन्हें नरक जमपुर मने।
दास तुलसी सरन आयो राखिये अपने॥
मैं हरि, पतित पावन सुने।
मैं पतित, तुम पतित-पावन, दोउ बानक बने॥
ब्याध गनिक अगज अजामिल, साखि निगमनि भने।
और अधम अनेक तारे, जात कापै गने॥
जानि नाम अजानि लीन्हें नरक जमपुर मने।
दास तुलसी सरन आयो राखिये अपने॥

Tulsidas (1497–1623), also known as Goswami Tulsidas, was a Ramanandi Vaishnava saint and poet, renowned for his devotion to the deity Rama. He wrote several popular works in Sanskrit and Awadhi, but is best known as the author of the epic Ramcharitmanas, a r…
View profile & all 26 Poems / Storiesकेशव , कहि न जाइ का कहिये ।देखत तव रचना विचित्र अति ,समुझि मनहिमन रहिये ।
सुन मन मूढ सिखावन मेरो।हरिपद विमुख लह्यो न काहू सुख,सठ समुझ सबेरो॥
हरि! तुम बहुत अनुग्रह किन्हों।साधन-नाम बिबुध दुरलभ तनु, मोहि कृपा करि दीन्हों॥१॥
लाज न आवत दास कहावत।सो आचरन-बिसारि सोच तजि जो हरि तुम कहँ भावत॥१॥
मैं केहि कहौ बिपति अति भारी। श्रीरघुबीर धीर हितकारी॥मम ह्रदय भवन प्रभु तोरा। तहँ बसे आइ बहु चोरा॥