इलाहाबादी

TrilochanTrilochan20 Aug 1917 – 9 Dec 2007

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काफ़े,रेस्त्राँ में हिलमिल कर बैठे । बातें
कीं; कुछ व्यंग्य-विनोद और कुछ नए टहोके
लहरों में लिए-दिए । अपनी-अपनी घातें
रहे ताकते । यों भीतर-भीतर मन दो के
एक न हुए, समीप टिके, अपनापा खो के,
जीवन से अनजान रहे, पर गाना गाया
जन का, जीवन का, लेकिन दुनिया के हो के
दुनिया में न रहे । दुनिया को बुरा बताया ।
उससे तन बैठे जिसने कुछ दोष दिखाया ।
इस प्रकार से ढले नवीन इलाहाबादी
कवि-साहित्यकार, जिन को भाती है छाया,
नहीं सुहाती । आँखों को भू की आबादी ।

जीवन जिस धरती का है । कविता भी उस की
सूक्ष्म सत्य है, तप है, नहीं चाय की चुस्की ।

 

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About the poet

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कवि त्रिलोचन (20-08-1917 - 09-12-2007) हिंदी भाषा के श्रेष्ठ कवि थे . उन्हें हिन्दी साहित्य की प्रगतिशील काव्यधारा का प्रमुख हस्ताक्षर माना जाता है। वे आधुनिक हिंदी कविता की प्रगतिशील त्रयी के तीन स्तंभों में से एक थे। त्रिलोचन शास्त्री हिंदी के अतिरिक्त अरबी…

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