एकनि के बचन सुनत अति सुख होई ,
फल से झरत हैं अधिक मनभावने.
एकनि के बचन पखान बरषत मानौ,
स्रवन कै सुनतहिं लगत अनखावन .
एकनि के बचन कंटक कटुक विषरूप,
करत मरम छेद, दुख उपजावने .
सुंदर कहत घट-घट में बचन भेद ,
उत्तम अरु मध्यम अरु अधम सुनावने.
एकनि के बचन सुनत अति सुख होई ,
फल से झरत हैं अधिक मनभावने.
एकनि के बचन पखान बरषत मानौ,
स्रवन कै सुनतहिं लगत अनखावन .
एकनि के बचन कंटक कटुक विषरूप,
करत मरम छेद, दुख उपजावने .
सुंदर कहत घट-घट में बचन भेद ,
उत्तम अरु मध्यम अरु अधम सुनावने.

Sunderdas (1596–1689) was a noted saint, poet, philosopher and social reformer of medieval India. He was a disciple of Dadu Dayal. Sunderdas was born in Dausa in Rajasthan state in India. Sant Sunderdas composed about 48 books. He is revered as the Sankaracha…
View profile & all 8 Poems / Storiesतेल जरै बाती जरै, दीपक जरै न कोइ।दीपक जरताँ सब कहै, भारी अजरज होइ॥
गज अलि मीन पतंग मृग, इक-इक दोष बिनाश।जाके तन पाँचौं बसै, ताकी कैसी आश॥
गेह तज्यो अरु नेह तज्यो पुनि खेह लगाई कै देह संवारी .मेह सहे सिर, सीत सहे तन धूप समै जो पंचागिनि बारी.
बोलिए तौ तब जब बोलिबे की बुद्धि होय,ना तौ मुख मौन गहि चुप होय रहिए.
पति ही सूं प्रेम होय, पति ही सूं नेम होय,पति ही सूं छेम होय , पति ही सूं रात है.