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युद्ध: एक परिकल्पना

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युद्ध: एक परिकल्पना
लड़ते हैं आपस में देश
लड़ते हैं आपस में लोग
किन्हीं व्यापक सत्यों की रक्षा के लिए
किन्हीं महान आदर्शों को
जीवित देखने की कामना में,
कौन देश है जिसने
युद्ध के दौरान
मात्र सत्य का सहारा लिया हो
धर्म को वरा हो,
चाहे ‘शत्रु’ बेचारा कितना ही खरा हो!

जहाँ निहत्थे अभिमन्यु को
धुरंधरों ने घेर लिया था
क्या वह धर्मयुद्ध नहीं था?
धर्मयुद्ध में मैंने
मंदिरों, मस्जिदों, गिरजाघरों,
हस्पतालों और जेलों को जलते हुए देखा है!
क्या इसी का नाम है धर्म?
क्या इसी का नाम है युद्ध?

रात मैंने सपने में देखा था स्वयं को
पागल के रूप में
जो संसार के विवेकशील पुरुषों को
सलाह दे रहा था-
‘सारे महाद्वीपों
सारे देशों
सारे लोगों!
तुम सब एक तरफ होकर
युद्ध-धर्म से लड़ो
धर्म-युद्ध से लड़ो
एक-दूसरे को अपनी ही फौज का
सिपाही समझकर
युद्ध से लड़ते हुए कुरबान हो जाओ।’

किंतु वह कौन-सा सपना है
जो टूटा नहीं है?
और मैं सोच रहा हूँ-
नींद बहुत बेहतर है
ऐसे जग जाने से।

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Sootradhar