ग़म के पैहम

Sarvesh ChandausiSarvesh Chandausi1 Jul 1941 – 25 May 2020

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ग़म के पैहम बारिशों से हर ख़ुशी ख़तरे में है। सच तो ये है आदमी की ज़िन्दगी ख़तरे में है।। धूप की शिद्दत से डर कर बोला, कुहरे से धुआँ। ऐ मेरे भाई! अब अपनी दोस्ती ख़तरे में है।। शहर की सड़कों को चौड़ी और करने के सबब। मेरे पुरखों की बनाई झोंपड़ी ख़तरे में है।। घर के घर जिसने उजाड़े, खेतियाँ बर्बाद कीं। कहर बरपा करने वाली वो नदी ख़तरे में है।। देख कर गुड़िया मिरी बच्ची की आँखों में चमक। पैदा करने वाले मेरी मु़फलिसी ख़तरे में है।। झूठ के कजजाक हर इक गाम पर मौजूद हैं।। साथियों! सच्चाइयों की पालकी ख़तरे में है।। अहदे-हाजिर पर करूँगा तब्सिरा बेलौस मैं। जिसमें ऐ 'सर्वेश' सच्ची शायरी ख़तरे में है।।
Sarvesh Chandausi
About the poet

Sarvesh Chandausi

जन्म : १ जुलाई १९४९, चन्दौसी, मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश) में शिक्षा : बी. एससी. लेखन : गीत, ग़ज़ल, दोहे, रुबाई, मुक्तक, कहानियाँ काव्य पाठ : कवि सम्मेलन, मुशायरा, रेडियो स्टेशन, तथा दूरदर्शन से काव्यपाठ

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