अगर भूले से

Sarvesh ChandausiSarvesh Chandausi1 Jul 1941 – 25 May 2020

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अगर भूले से आ जाती हवाएँ बन्द कमरे में।
तो घुट कर मर नहीं पाती दुआएँ बन्द कमरे में।।

सहर की सुर्ख किरनों ने किया महसूस शिद्दत से।
मुसलसल रात भर बरसी घटाएँ बंद कमरे में।।

सिवा मेरे न सुन पाया कोई कुछ इस तरह मैंने।
ब-नामे-हिज्र तुझको दीं सदाएँ बंद कमरे में।।

जो अपने सख्त जुम्लों से करे नंगा सियासत को।
वो पागल रात-दिन काटे सजाएँ बंद कमरे में।।

हवाओं! जर्द पत्तों को न छेड़ो शोर होता है।
अधूरा ख़्वाब बुनती हैं, वफ़ाएँ बंद कमरे में।।

वो दोनों ही मुहज्‍ज़ब हैं, महर ये बारहा देखा।
हुई हैं ज़ख्म आलूदा क़बाएँ बंद कमरे में।।

बचाना ग़ैर मुमकिन है मुझे दस्ते अजल से तो।
वो क्यों 'सर्वेश' देते हैं दवाएँ बंद कमरे में।।

Sarvesh Chandausi
About the poet

Sarvesh Chandausi

जन्म : १ जुलाई १९४९, चन्दौसी, मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश) में शिक्षा : बी. एससी. लेखन : गीत, ग़ज़ल, दोहे, रुबाई, मुक्तक, कहानियाँ काव्य पाठ : कवि सम्मेलन, मुशायरा, रेडियो स्टेशन, तथा दूरदर्शन से काव्यपाठ

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