आँखें

Saadat Hasan MantoSaadat Hasan Manto11 May 1912

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उस के सारे जिस्म में मुझे उस की आँखें बहुत पसंद थीं।

ये आँखें बिलकुल ऐसी ही थीं जैसे अंधेरी रात में मोटर कार की हैड लाईटस जिन को आदमी सब से पहले देखता है। आप ये न समझिएगा कि वो बहुत ख़ूबसूरत आँखें थीं। हरगिज़ नहीं। मैं ख़ूबसूरती और बद-सूरती में तमीज़ कर सकता हूँ। लेकिन माफ़ कीजिएगा, इन आँखों के मुआमले में सिर्फ़ इतना ही कह सकता हूँ कि वो ख़ूबसूरत नहीं थीं। लेकिन इस के बावजूद उन में बे-पनाह कशिश थी।

मेरी और उन आँखों की मुलाक़ात एक हस्पताल में हुई। मैं उस हस्पताल का नाम आप को बताना नहीं चाहता, इस लिए कि इस से मेरे इस अफ़साने को कोई फ़ायदा नहीं पहुंचेगा।

बस आप यही समझ लीजिए कि एक हस्पताल था, जिस में मेरा एक अज़ीज़ ऑप्रेशन कराने के बाद अपनी ज़िंदगी के आख़िरी सांस ले रहा था।

यूं तो मैं तीमारदारी का क़ाइल नहीं, मरीज़ों के पास जा कर उन को दम दिलासा देना भी मुझे नहीं आता। लेकिन अपनी बीवी के पैहम-इसरार पर मुझे जाना पड़ता कि मैं अपने मरने वाले अज़ीज़ को अपने ख़ुलूस और मोहब्बत का सबूत दे सकूं।

यक़ीन मानीए कि मुझे सख़्त कोफ़्त हो रही थी। हस्पताल के नाम ही से मुझे नफ़रत है, मालूम नहीं क्यों। शायद इस लिए कि एक बार बंबई में अपनी बूढ़ी हमसाई को जिस की कलाई में मोच आ गई थी, मुझे जे जे हस्पताल में ले जाना पड़ा था। वहां कियूजवालटी डिपार्टमैंट में मुझे कम-अज़-कम ढाई घंटे इंतिज़ार करना पड़ा था। वहां में जिस आदमी से भी मिला, लोहे के मानिंद सर्द और बे-हिस था।

मैं उन आँखों का ज़िक्र कर रहा था जो मुझे बेहद पसंद थीं।

पसंद का मुआमला इन्फ़िरादी हैसियत रखता है। बहुत मुम्किन है अगर आप ये आँखें देखते तो आप के दिल-ओ-दिमाग़ में कोई रद्द-ए-अमल पैदा न होता। ये भी मुम्किन है कि आप से अगर उन के बारे में कोई राय तलब की जाती तो आप कह देते। निहायत वाहीयात आँखें हैं। लेकिन जब मैंने उस लड़की को देखा तो सब से पहले मुझे उस की आँखों ने अपनी तरफ़ मुतवज्जा किया।

वो बुर्क़ा पहने हुए थी, मगर नक़ाब उठा हुआ था। उस के हाथ में दवा की बोतल थी और वो जनरल वार्ड के बरामदे में एक छोटे से लड़के के साथ चली आ रही थी।

मैंने उस की तरफ़ देखा तो उस की आँखों में जो बड़ी थीं, न छोटी, स्याह थीं न भूरी, नीली थीं न सब्ज़, एक अजीब क़िस्म की चमक पैदा हुई। मेरे क़दम रुक गए। वो भी ठहर गई। उस ने अपने साथी लड़के का हाथ पकड़ा और बौखलाई हुई आवाज़ में कहा। “तुम से चला नहीं जाता!”

लड़के ने अपनी कलाई छुड़ाई और तेज़ी से कहा। “चल तो रहा हूँ। तू तो अंधी है!”

मैंने ये सुना तो उस लड़की की आँखों की तरफ़ दुबारा देखा। इस के सारे वजूद में सिर्फ़ उस की आँखें ही थीं जो पसंद आई थीं।

मैं आगे बढ़ा और उस के पास पहुंच गया। उस ने मुझे पलकें न झपकने वाली आँखों से देखा और पूछा। “ऐक्सरे कहाँ लिया जाता है?”

इत्तिफ़ाक़ की बात है कि उन दिनों ऐक्सरे डिपार्टमैंट में मेरा एक दोस्त काम कर रहा था, और मैं उसी से मिलने के लिए आया था। मैंने उस लड़की से कहा। “आओ, मैं तुम्हें वहां ले चलता हूँ, मैं भी उधर ही जा रहा हूँ।”

लड़की ने अपने साथी लड़के का हाथ पकड़ा और मेरे साथ चल पड़ी। मैंने डाक्टर सादिक़ को पूछा तो मालूम हुआ कि वो ऐक्सरे लेने में मसरूफ़ हैं।

दरवाज़ा बंद था और बाहर मरीज़ों की भीड़ लगी थी। मैंने दरवाज़ा खटखटाया। अंदर से तेज़-ओ-तुंद आवाज़ आई। “कौन है......... दरवाज़ा मत ठोको!”

लेकिन मैंने फिर दस्तक दी। दरवाज़ा खुला और डाक्टर सादिक़ मुझे गाली देते देते रह गया। “ओह तुम हो!”

“हाँ भई.........मैं तुम से मिलने आया था। दफ़्तर में गया तो मालूम हुआ कि तुम यहां हो।”

“आ जाओ अंदर”

मैंने लड़की की तरफ़ देखा और उस से कहा “आओ......... लेकिन लड़के को बाहर ही रहने दो!”

डाक्टर सादिक़ ने हौले से मुझ से पूछा। “कौन है ये?”

मैंने जवाब दिया। “मालूम नहीं कौन है......... ऐक्सरे डिपार्टमैंट को पूछ रही थी। मैंने कहा चलो, मैं लिए चलता हूँ।”

डाक्टर सादिक़ ने दरवाज़ा और ज़्यादा खोल दिया। में और वो लड़की अंदर दाख़िल हो गए।

चार पाँच मरीज़ थे। डाक्टर सादिक़ ने जल्दी जल्दी उन की स्क्रीनिंग की और उन्हें रुख़स्त किया। इस के बाद कमरे में हम सिर्फ़ दो रह गए। मैं और वो लड़की।

डाक्टर सादिक़ ने मुझ से पूछा। “इन्हें क्या बीमारी है?”

मैंने उस लड़की से पूछा। “क्या बीमारी है तुम्हें......... ऐक्सरे के लिए तुम से किस डाक्टर ने कहा था?”

अंधेरे कमरे में लड़की ने मेरी तरफ़ देखा और जवाब दिया। “मुझे मालूम नहीं क्या बीमारी है......... हमारे मुहल्ले में एक डाक्टर है, उस ने कहा था कि ऐक्सरे लो।”

डाक्टर सादिक़ ने इस से कहा कि मशीन की तरफ़ आए। वो आगे बढ़ी तो बड़े ज़ोर के साथ उस से टकरा गई। डाक्टर ने तेज़ लहजे में उस से कहा। “क्या तुम्हें सुझाई नहीं देता।”

लड़की ख़ामोश रही। डाक्टर ने उस का बुर्क़ा उतारा और स्क्रीन के पीछे खड़ा कर दिया। फिर उस ने सोइच ऑन किया। मैंने शीशे में देखा तो मुझे उस की पसलियां नज़र आईं। उस दिल भी एक कोने में काले से धब्बे की सूरत में धड़क रहा था।

डाक्टर सादिक़ पाँच छः मिनट तक उस की पसलियों और हड्डियों को देखता रहा। इस के बाद उस ने सोइच ऑफ़ कर दिया और रौशनी कर के मुझ से मुख़ातब हुआ। “छाती बिलकुल साफ़ है।”

लड़की ने मालूम नहीं क्या समझा कि अपनी छातियों पर जो काफ़ी बड़ी बड़ी थीं, दोपट्टे को दुरुस्त किया और बुर्क़ा ढ़ूढ़ने लगी।

बुर्क़ा एक कोने में मेज़ पर पड़ा था। मैंने बढ़ कर उसे उठाया और उस के हवाले कर दिया। डाक्टर सादिक़ ने रिपोर्ट लिखी और इस से पूछा। “तुम्हारा नाम क्या है?”

लड़की ने बुर्क़ा ओढ़ते हुए जवाब दिया। “जी मेरा नाम......... मेरा नाम हनीफा है।”

“हनीफा!” डाक्टर सादिक़ ने उस का नाम पर्ची पर लिखा और उस को दे दी। “जाओ, ये अपने डाक्टर को दिखा देना।”

लड़की ने पर्ची ली और क़मीज़ के अंदर अपनी अंगया में उड़स ली।

जब वो बाहर निकल तो मैं ग़ैर-इरादी तौर पर उस के पीछे पीछे था। लेकिन मुझे इस का पूरी तरह एहसास था कि डाक्टर सादिक़ ने मुझे शक की नज़रों से देखा था। उसे जहां तक मैं समझता हूँ, इस बात का यक़ीन था कि उस लड़की से मेरा तअल्लुक़ है, हालाँकि जैसा आप जानते हैं, ऐसा कोई मुआमला नहीं था......... सिवाए इस के कि मुझे उस की आँखें पसंद आ गई थीं।

मैं उस के पीछे पीछे था। उस ने अपने साथी लड़की की उंगली पकड़ी हुई थी। जब वो तांगों के अड्डे पर पहुंचे तो मैंने हनीफा से पूछा। “तुम्हें कहाँ जाना है?”

उस ने एक गली का नाम लिया तो मैंने उस से झूट मूट कहा। “मुझे भी उधर ही जाना है......... मैं तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ दूंगा।”

मैंने जब उस का हाथ पकड़ कर तांगे में बिठाया तो मुझे महसूस हुआ कि मेरी आँखें ऐक्स रेज़ का शीशा बन गई हैं। मुझे उस का गोश्त पोस्त दिखाई नहीं देता था......... सिर्फ़ ढांचा नज़र आता था......... लेकिन उस की आँखें......... वो बिलकुल साबित-ओ-सालिम थीं, जिन में बे-पनाह कशिश थी।

मेरा जी चाहता था कि इस के साथ बैठूं लेकिन ये सोच कर कोई देख लेगा, मैंने उस के साथी लड़के को उस के साथ बिठा दिया और आप अगली नशिस्त पर बैठ गया।

“मैं.........मैं सआदत हसन मंटो हूँ।”

“मंटो......... ये मंटो क्या हुआ?”

“कश्मीरियों की एक ज़ात है।”

“हम भी कश्मीरी हैं।”

“अच्छा!”

“हम किंग वाएं हैं।”

मैंने मुड़ कर इस से कहा। “ये तो बहुत ऊंची ज़ात है।”

वो मुस्कुराई और उस की आँखें और ज़्यादा पुर-कशिश हो गईं।

मैंने अपनी ज़िंदगी में बे-शुमार ख़ूबसूरत आँखें देखी थीं। लेकिन वो आँखें जो हनीफा के चेहरे पर थीं, बे-हद पुर-कशिश थीं। मालूम नहीं उन में क्या चीज़ थी जो कशिश का बाइस थी। मैं इस से पेशतर अर्ज़ कर चुका हूँ कि वो क़तअन ख़ूबसूरत नहीं थीं, लेकिन इस के बावजूद मेरे दिल में खब रही थीं।

मैंने जसारत से काम लिया और इस के बालों की एक लुट को जो उस के माथे पर लटक कर उस की एक आँख को ढाँप रही थी, उंगली से उठाया और उस के सर पर चस्पाँ कर दी। इस ने बुरा न माना।

मैंने और जसारत की और इस का हाथ अपने हाथ में ले लिया। इस पर भी उस ने कोई मुज़ाहमत न की और अपने साथी लड़के से मुख़ातब हूई। “तुम मेरा हाथ क्यों दबा रहे हो?”

मैंने फ़ौरन उस का हाथ छोड़ दिया और लड़के से पूछा। “तुम्हारा मकान कहाँ है?”

लड़के ने हाथ का इशारा किया। “इस बाज़ार में!”

तांगे ने उधर का रुख़ किया, बाज़ार में बहुत भीड़ थी, ट्रैफ़िक भी मामूल से ज़्यादा। ताँगा रुक रुक कर चल रहा था। सड़क में चूँकि गढ़े थे, इस लिए ज़ोर के धचके लग रहे थे, बार बार उस का सर मेरे कंधों से टकराता था और मेरा जी चाहता था कि उसे अपने ज़ानू पर रख लूं और उस की आँखें देखता रहूं।

थोड़ी देर के बाद इन का घर आ गया। लड़के ने तांगे वाले से रुकने के लिए कहा। जब ताँगा रुका तो वो नीचे उतरा। हनीफा बैठी रही। मैंने उस से कहा। “तुम्हारा घर आ गया है!”

हनीफा ने मुड़ कर मेरी तरफ़ अजीब-ओ-ग़रीब आँखों से देखा। “बदरु कहाँ है?”

मैंने उस से पूछा। “कौन बदरु?”

“वो लड़का जो मेरे साथ था।”

मैंने लड़के की तरफ़ देखा जो तांगे के पास ही था। “ये खड़ा तो है!”

“अच्छा......... ” ये कह कर उस ने बदरु से कहा। “बदरु! मुझे उतार तो दो।”

बदरु ने उस का हाथ पकड़ा और बड़ी मुश्किल से नीचे उतारा। मैं सख़्त मुतहय्यर था। पिछली नशिस्त पर जाते हुए मैंने उस लड़के से पूछा। “क्या बात है ये ख़ुद नहीं उतर सकतीं?”

बदरु ने जवाब दिया। “जी नहीं......... इन की आँखें ख़राब हैं......... दिखाई नहीं देता।”

(1954)

Saadat Hasan Manto
About the poet

Saadat Hasan Manto

Saadat Hasan Manto (/mɑːn, -tɒ/; Urdu: سعادت حسن منٹو‎, pronounced [səˈaːd̪ət̪ ˈɦəsən ˈməɳʈoː]; 11 May 1912 – 18 January 1955) was a Pakistani writer, playwright and author born in Ludhiana, British India. Writing mainly in the Urdu language, he produced 22 c…

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चलो.... मलिका का बुत तोड़ें!<br />दूसरे ने कहा &mdash; नहीं यार.... कोतवाली को आग लगाएँ!<br />तीसरे ने कहा &mdash; और सारे बैंकों को भी!<br />चौथे ने उन को रोका &mdash; ठहरो.... इस से क्या फ़ायदा... चलो पुल पर उन लोगों को मारें।<br />मैंने उस को पहचान लिया। ये थैला कंजर था.... नाम मोहम्मद तुफ़ैल था, मगर थैला कंजर के नाम से मशहूर था। इस लिए कि एक तवाइफ़ के बतन से था। बड़ा आवारागर्द था। छोटी उम्र ही में उस को जोय और शराबनोशी की लत पड़ गई थी। इस की दो बहनें शमशाद और अलमास अपने वक़्त की हसीन-तरीन तवाइफ़ें थीं। शमशाद का गला बहुत अच्छा था। उस का मुजरा सुनने के लिए रईस बड़ी-बड़ी दूर से आते थे। दोनोंअपने भाई के करतूतों से बहुत नालाँ थीं। शहर में मशहूर था कि उन्होंने एक क़िस्म का उस को आक़ कर रखा है। फिर भी वो किसी न किसी हीले अपनी ज़रूरीयात के लिए उन से कुछ न कुछ वसूल कर ही लेता था। वैसे वो बहुत ख़ुशपोश रहता था। अच्छा खाता था, अच्छा पीता था। बड़ा नफ़ासत-पसन्द था। हँसोड़पन और लतीफ़ागोई मिज़ाज में कूट-कूट के भरी थी। मीरासियों और भाण्डों के सोक़यानापन से बहुत दूर रहता था।लम्बा क़द, भरे-भरे हाथ-पाँव, मज़बूत कसरती बदन। नाक नक़्शे का भी ख़ासा था।<br />पुरजोश लड़कों ने उस की बात न सुनी और मलिका के बुत की तरफ़ चलने लगे। उस ने फिर उनसे कहा &mdash; मैंने कहा मत ज़ाए करो अपना जोश। इधर आओ मेरे साथ.... चलो उन को मारें, जिन्होंने हमारे बेक़सूर आदमियों की जान ली है और उन्हें ज़ख़्मी किया है..... ख़ुदा की क़सम, हम सब मिलकर उनकी गर्दन मरोड़ सकते हैं... चलो!<br />कुछ लड़के रवाना हो चुके थे। बाक़ी रुक गए। थैला पुल की तरफ़ बढ़ा तो वे सब उस के पीछे चलने लगे। मैंने सोचा कि माँओं के ये लाल बेकार मौत के मुँह में जा रहे हैं। मैं फव्वारे के पास दुबका खड़ा था। वहीं से मैंने थैले को आवाज़ दी और कहा &mdash; मत जाओ यार... क्यों अपनी और उनकी जान के पीछे पड़े हो।<br />थैले ने यह सुनकर एक अजीब-सा क़हक़हा बुलन्द किया और मुझ से कहा &mdash; थैला सिर्फ़ ये बताने चला है कि वो गोलियों से डरने वाला नहीं। फिर वो अपने साथियों से मुख़ातिब हुआ &mdash; तुम डरते हो तो वापस जा सकते हो।<br />ऐसे मौक़ों पर बढ़े हुए क़दम उल्टे कैसे हो सकते हैं। और फिर वो भी उस वक़्त जब लीडर अपनी जान हथेली पर रख कर आगे-आगे जा रहा हो।थैले ने क़दम तेज़ किए तो उसके साथियों को भी करने पड़े।<br />हाल दरवाज़े से पुल का फ़ासला कुछ ज़्यादा नहीं.... होगा कोई साठ-सत्तर गज़ के क़रीब.... थैला सब से आगे-आगे था। जहाँ से पुल का दोरौया मुतवाज़ी जंगला शुरू होता है, वहाँ से पन्द्रह- बीस क़दम के फ़ासले पर दो घुड़सवार गोरे खड़े थे। थैला नारे लगाता जब बंगले के आग़ाज़ के पास पहुँचा तो फ़ायर हुआ, मैं समझा कि वो गिर पड़ा है... लेकिन देखा कि वो उसी तरह.... ज़िन्दा आगे बढ़ रहा है। उसके बाक़ी साथी डर के भाग उठे हैं। मुड़कर उसने पीछे देखा और चिल्लाया &mdash; भागो नहीं.... आओ!<br />उस का मुँह मेरी तरफ़ था कि एक और फ़ायर हुआ। पलट कर उसने गोरों की तरफ़ देखा और पीठ पर हाथ फेरा... भाईजान, नज़र तो मुझे कुछ नहीं आना चाहिए था, मगर मैंने देखा कि उस की सफ़ेद बोसकी की क़मीज़ पर लाल-लाल धब्बे थे.... वो और तेज़ी से बढ़ा, जैसे ज़ख़्मी शेर... एक और फ़ायर हुआ। वो लड़खड़ाया मगर एकदम क़दम मज़बूत करके वो घुड़सवार गोरे पर लपका और एकाएक न जाने क्या हुआ.... घोड़े की पीठ ख़ाली थी। गोरा ज़मीन पर था और थैला उस के ऊपर.... दूसरे गोरे ने, जो क़रीब था और पहले बौखला गया था, बिदकते हुए घोड़े को रोका और धड़ाधड़ फ़ायर शुरू कर दिए.... इस के बाद जो कुछ हुआ मुझे मालूम नहीं। मैं वहाँ फव्वारे के पास बेहोश हो कर गिर पड़ा।<br />भाईजान, जब मुझे होश आया तो में अपने घर में था। चन्द पहचान केआदमी मुझे वहाँ से उठा लाए थे। उन की ज़बानी मालूम हुआ कि पुल पर से गोलियाँ खाकर हुजूम उग्र हो गया था। नतीजा इसका ये हुआ कि मलिका के बुत को तोड़ने की कोशिश की गई। टाउन हाल और तीन बैंकों को आग लगी और पाँच या छह यूरोपियन मारे गए। ख़ूब लूट मची।<br />लूट-खसोट का अँग्रेज़ अफ़सरों को इतना ख़याल नहीं था। पाँच या छःयूरोपियन हलाक हुए थे। इस का बदला लेने के लिए ही जलियाँवाला बाग़ का ख़ूनीं हादिसा हुआ। डिप्टी कमिशनर बहादुर ने शहर की बागडोर जनरल डावर के सपुर्द कर दी। चुनांचे जनरल साहिब ने बारह अप्रैल को फ़ौजियों के साथ शहर के मुख़्तलिफ़ बाज़ारों में मार्च किया और दर्जनों बेगुनाह आदमी गिरफ़्तार किए। तेरह को जलियाँवाला बाग़ में जलसा हुआ। क़रीब-क़रीब पच्चीस हज़ार का मजमा था। शाम के क़रीब जनरल डावर मुसल्लह गोरों और सिखों के साथ वहाँ पहुँचा और निहत्थे आदमियों पर गोलियों की बारिश शुरू कर दी।<br />उस वक़्त तो किसी को इसका ठीक-ठीक अन्दाज़ा नहीं था कि कितने आदमी मारे गए हैं। लेकिन बाद में जब जाँच हुई तो पता चला कि एक हज़ार हलाक हुए हैं और तीन या चार हज़ार के क़रीब ज़ख़्मी.... लेकिन मैं थैले की बात कर रहा था...। भाईजान, आँखों देखी आप को बता चुका हूँ... बे-ऐब ज़ात ख़ुदा की है। मरहूम में चारों ऐब शरई थे। एक पेशा तवाइफ़ के बतन से था मगर जियाला था.... मैं अब यक़ीन के साथ कह सकता हूँ कि इस मलऊन गोरे की पहली गोली भी उस को लगी थी। आवाज़ सुन कर उस ने जब पलटकर अपने साथियों की तरफ़ देखा था, और उन्हें हौसला दिलाया था, तब जोश की हालत में उस को मालूम नहीं हुआ था कि उसकी छाती में गर्म-गर्म सीसा उतर चुका है। दूसरी गोली उस की पीठ में लगी। तीसरी फिर सीने में.... मैंने देखा नहीं, पर सुना है जब थैले की लाश गोरे से जुदा की गई तो उसके दोनों हाथ उस की गर्दन में इस बुरी तरह से पैवस्त थे कि अलहदा ही नहीं होते थे.... गोरा तब जहन्नुम में जा चुका था...।<br />दूसरे रोज़, जब थैले की लाश कफ़न-दफ़न के लिए उस के घर वालों के सुपुर्द की गई तो उसका बदन गोलियों से छलनी हो रहा था.... दूसरे गोरे ने तो अपना पूरा पिस्तौल ही उस पर ख़ाली कर दिया था... मेरा ख़याल है, उस वक़्त मरहूम की रूह क़फ़स-ए-उंसुरी से परवाज़ कर चुकी थी। इस शैतान के बच्चे ने सिर्फ़ उस के मुर्दा जिस्म पर चाँदमारी की थी।<br />कहते हैं, जब थैले की लाश मुहल्ले में पहुँची तो कुहराम मच गया। अपनी बिरादरी में वो इतना मक़बूल नहीं था, लेकिन उस की क़ीमा-क़ीमा लाश देखकर सब धाड़ें मार-मार कर रोने लगे। उस की बहनें शमशाद और अलमास तो बेहोश हो गईं। जब जनाज़ा उठा तो इन दोनों ने ऐसे बीन किए कि सुनने वाले लहू के आँसू रोते रहे।<br />भाईजान, मैंने कहीं पढ़ा था कि फ़्राँस के इन्क़लाब में पहली गोली वहाँ की एक टखयाई को लगी थी। मरहूम मुहम्मद तुफ़ैल एक तवाइफ़ का लड़का था। इन्क़लाब की इस जद्द-ओ-जहद में उसको जो पहली गोली लगी थी, दसवीं थी या पचासवीं। इस के मुताल्लिक़ किसी ने भी तहक़ीक़ नहीं की। शायद इसलिए कि सोसाइटी में इस ग़रीब का कोई रुतबा नहीं था। मैं तो समझता हूँ कि पंजाब के इस ख़ूनीं ग़ुसल में नहाने वालों की फ़हरिस्त में थैले कंजर का नाम-ओ-निशान तक भी नहीं होगा... और ये भी कोई पता नहीं कि ऐसी कोई फ़हरिस्त तैयार भी हुई थी।<br />सख़्त हंगामी दिन थे। फ़ौजी हुकूमत का दौर-दौरा था। वो देव, जिसे मार्शल लॉ कहते हैं, शहर के गली-गली कूचे-कूचे में डकारता फिरता था। बहुत अफ़रा-तफ़री के आलम में उस ग़रीब को जल्दी-जल्दी यूँ दफ़न किया गया, जैसे उसकी मौत उसके सोगवार अज़ीज़ों का एक संगीन जुर्म थी जिसके निशानात वो मिटा देना चाहते थे।<br />बस भाईजान, थैला मर गया। थैला दफ़ना दिया गया और.... और ये कहकर मेरा हमसफ़र पहली मर्तबा कुछ कहते-कहते रुका और ख़ामोश हो गया। ट्रेन दनदनाती हुई जा रही थी। पटरियों की खटाखट ने ये कहना शुरू कर दिया। थैला मर गया... थैला दफ़ना दिया गया.... थैला मर गया.... थैला दफ़ना दिया गया। इस मरने और दफ़नाने के दरमयान कोई फ़ासला नहीं था, जैसे वो इधर मरा और उधर दफ़ना दिया गया। और खट-खट के साथ इन अलफ़ाज़ की हम-आहंगी कुछ इस क़दर जज़्बात से आरी थी कि मुझे अपने दिमाग़ से इन दोनों को जुदा करना पड़ा। चुनाँचे मैंने अपने हम-सफ़र से कहा &mdash; आप कुछ और भी सुनाने वाले थे?<br />चौंक कर उस ने मेरी तरफ़ देखा और बोला &mdash; जी हाँ.... इस दास्तान का एक अफ़सोसनाक हिस्सा बाक़ी है।<br />मैंने पूछा &mdash; वह क्या?<br />उस ने कहना शुरू किया &mdash; मैं आप से अर्ज़ कर चुका हूँ कि थैले की दो बहनें थीं। शमशाद और अलमास। बहुत ख़ूबसूरत थीं। शमशाद लम्बी थी।पतले-पतले नक़्श। ग़लाफ़ी आँखें। ठुमरी बहुत ख़ूब गाती थी। सुना है, ख़ाँ साहब, फ़तह अली ख़ां से तालीम लेती रही थी। दूसरी अलमास थी। उस के गले में सुर नहीं था, लेकिन नाचने में अपना सानी नहीं रखती थी। मुजरा करती थी तो ऐसा लगता था कि इस का अंग-अंग बोल रहा है। हर भाव में एक घात होती थी.... आँखों में वो जादू था जो हर एक के सर पर चढ़ के बोलता था।<br />मेरे हमसफ़र ने तारीफ़-ओ-तौसीफ में कुछ ज़रूरत से ज़्यादा वक़्त लिया। मगर मैंने टोकना मुनासिब न समझा। थोड़ी देर के बाद वो ख़ुद इस लम्बे चक्कर से निकला और दास्तान के अफ़सोनाक हिस्से की तरफ़ आया &mdash; क़िस्सा यह है, भाईजान, कि इन आफ़त की परकाला दो बहनों के हुस्न-ओ-जमाल का ज़िक्र किसी ख़ुशामदी ने फ़ौजी अफ़सरों से कर दिया.... बल्वे में एक मेम.... क्या नाम था उस चुड़ैल का?मिस....मिस शेरवुड मारी गई थी.... तय ये हुआ कि उन को बुलवाया जाए और.... और.... जी भर के इंन्तकाम लिया जाए.... आप समझ गए ना, भाई जान?<br />मैंने कहा &mdash; जी हाँ!<br />मेरे हमसफ़र ने एक आह भरी &mdash; ऐसे नाज़ुक मामलों में तवाइफ़ें और कस्बियाँ भी अपनी माँएँ-बहनें होती हैं.... मगर भाईजान ये मुल्क अपनी इज़्ज़त-ओ-नामूस को, मेरा ख़्याल है, पहचानता ही नहीं। जब ऊपर से इलाक़े के थानेदार को आर्डर मिला तो वो फ़ौरन तैयार हो गया। चुनांचे वो ख़ुद शमशाद और अलमास के मकान पर गया और कहा कि साहब लोगों ने याद किया है। वो तुम्हारा मुजरा सुनना चाहते हैं... भाई की क़ब्र की मिट्टी भी अभी तक ख़ुशक नहीं हुई थी। अल्लाह को प्यारा हुए उस ग़रीब को सिर्फ़ दो दिन हुए थे कि ये हाज़िरी का हुक्म सादिर हुआ कि आओ हमारे हुज़ूर नाचो.... अज़िय्यत का इससे बढ़ कर पुर-अज़िय्यत तरीक़ा क्या हो सकता है....? मुस्तबइद तम्सख़ुर की ऐसी मिसाल, मेरा ख़्याल है, शायद ही कोई और मिल सके.... क्या हुक्म देने वालों को इतना ख़याल भी न आया कि तवाइफ़ भी ग़ैरतमन्द होती है? ....हो सकती है... क्यों नहीं हो सकती? उस ने अपने आप से सवाल किया, लेकिन मुख़ातिब वो मुझसे ही था।<br />मैंने कहा &mdash; हाँ, हो सकती है!<br />&mdash; जी हाँ ....थैला आख़िर इन का भाई था। उस ने किसी की मार ख़ाने की लड़ाई-भिड़ाई में अपनी जान नहीं दी थी। वो शराब पी कर दंगा-फ़साद करते हुए हलाक नहीं हुआ था। उसने वतन की राह में बड़े बहादुराना तरीक़े पर शहादत का जाम पिया था। वो एक तवाइफ़ के बतन से था। लेकिन वो तवाइफ़ माँ थी और शमशाद और अलमास उसी की बेटियां थीं और ये थैले की बहनें थीं.... तवाइफ़ें बाद में थीं.... और वो थैले की लाश देख कर बेहोश हो गई थीं। जब उस का जनाज़ा उठा था तो उन्होंने ऐसे बीन किए थे कि सुन कर आदमी लहू रोता था....।<br />मैंने पूछा &mdash; वो गईं?<br />मेरे हमसफ़र ने इस का जवाब थोड़े वक़फ़े के बाद उदासी से दिया &mdash; जी हाँ... जी हाँ गईं... ख़ूब सज बनकर। एक दम उसकी उदासी गहरी हो गई &mdash; सोलह सिंगार करके अपने बुलाने वालों के पास गईं.... कहते हैं कि ख़ूब महफ़िल जमी.... दोनों बहनों ने अपने जौहर दिखाए.... ज़रक़-बरक़ पिशवाज़ों में मलबूस वो कोह-ए-क़ाफ़ की परियाँ मालूम होती थीं....शराब के दौर चलते रहे और वो नाचती-गाती रहीं... ये दोनों दौर चलते रहे .... और कहते हैं कि.... रात के दो बजे एक बड़े अफ़सर के इशारे पर महफ़िल बरख़ास्त हुई...।<br />मेरा हमसफ़र उठ खड़ा हुआ और बाहर भागते हुए दरख़्तों को देखने लगा।पहियों और पटरियों की आहनी गड़गड़ाहट की ताल पर उसके आख़िरी दो लफ़्ज़ नाचने लगे &mdash; बरख़ास्त हुई... बरख़ास्त हुई।<br />मैंने अपने दिमाग़ में उन्हें, आहनी गड़गड़ाहट से नोच कर अलहदा करते हुए उससे पूछा &mdash; फिर क्या हुआ?<br />भागते हुए दरख़्तों और खम्भों से नज़रें हटा कर उस ने बड़े मज़बूत लहजे में कहा &mdash; उन्होंने अपनी ज़रक़-बरक़ पिशवाज़ें नोच डालें और अलिफ़ नंगी हो गईं और कहने लगीं.... लो देख लो... हम थैले की बहनें हैं.... उस शहीद की, जिसके ख़ूबसूरत जिस्म को तुमने सिर्फ़ इसलिए अपनी गोलियों से छलनी-छलनी किया था कि उसमें वतन से मोहब्बत करने वाली रूह थी... हम उसी की ख़ूबसूरत बहनें हैं... आओ, अपनी शहवत के गर्म-गर्म लोहे से हमारा ख़ुशबूओं में बसा हुआ जिस्म दागदार करो.... मगर ऐसा करने से पहले सिर्फ़ हमें एक बार अपने मुँह पर थूक लेने दो...।<br />यह कहकर वो ख़ामोश हो गया। कुछ इस तरह कि और नहीं बोलेगा। मैंने फ़ौरन ही पूछा &mdash; फिर क्या हुआ?<br />उस की आँखों में आँसू डबडबा आए &mdash; उनको.... उनको गोली से उड़ा दिया गया।<br />मैंने कुछ न कहा। गाड़ी आहिस्ता होकर स्टेशन पर रुकी तो उस ने क़ुली बुलाकर अपना अस्बाब उठवाया। जब जाने लगा तो मैं ने उस से कहा &mdash; आपने जो दास्तान सुनाई, इस का अंजाम मुझे आप का ख़ुदसाख़्ता मालूम होता है।<br />एकदम चौंककर उसने मेरी तरफ़ देखा &mdash; ये आप ने कैसे जाना?<br />मैंने कहा &mdash; आप के लहजे में एक नाक़ाबिल-ए-बयान कर्ब था।<br />मेरे हमसफ़र ने अपने हलक़ की तल्ख़ी थूक के साथ निगलते हुए कहा &mdash; जी हाँ... उन हराम..., वो गाली देते-देते रुक गया &mdash; उन्होंने अपने शहीद भाई के नाम पर बट्टा लगा दिया।<br />यह कहकर वो प्लेटफार्म पर उतर गया।<br />(11-12 अक्तूबर1951 ईस्वी)</p>

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  3. अक्ल दाढ़

    आप मुँह सुजाये क्यों बैठे हैं?भई दाँत में दर्द हो रहा है तुम तो ख़्वाह-मख़्वाह ।

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  4. अनार कली

    नाम उस का सलीम था मगर उस के यार दोस्त उसे शहज़ादा सलीम कहते थे। ग़ालिबन इस लिए कि उस के ख़द-ओ-ख़ाल मुग़लई थे ख़ूबसूरत था। चाल ढाल से राऊनत टपकती थी।उस का बाप पीडब्ल्यू डी के दफ़्तर में मुलाज़िम था। तनख़्वाह ज़्यादा से ज़्यादा सौ रुपय होगी मगर बड़े ठाट से रहता ज़ाहिर है कि रिश्वत खाता था यही वजह है कि सलीम अच्छे से अच्छा कपड़ा पहनता जेब ख़र्च भी उस को काफ़ी मिलता इस लिए कि वो अपने वालदैन का इकलौता लड़का था।

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  5. अंजाम-ए-नजीर

    बटवारे के बाद जब फ़िर्का-वाराना फ़सादात शिद्दत इख़्तियार कर गए और जगह जगह हिंदूओं और मुस्लमानों के ख़ून से ज़मीन रंगी जाने लगी तो नसीम अख़तर जो दिल्ली की नौ-ख़ेज़ तवाइफ़ थी अपनी बूढ़ी माँ से कहा चलो माँ यहां से चलेंबूढ़ी बाइका ने अपने पोपले मुँह में पानदान से छालिया के बारीक बारीक टुकड़े डालते हुए उस से पूछा कहाँ जाऐंगे बेटा

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