ख़्वाब ही में रुख़-ए-पुर-नूर दिखाए कोई

Ratan PandoraviRatan Pandoravi7 Jul 1907 – 4 Nov 1990

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ख़्वाब ही में रुख़-ए-पुर-नूर दिखाए कोई
ग़म में राहत का भी पहलू नज़र आए कोई।

सामने उस के दिल ओ जान ओ जिगर मैं रख दूँ
हाँ मगर हाथ में ख़ंजर तो उठाए कोई।

अपने ही घर में मिला ढूँड रहे थे जिस को
उस के पाने के लिए ख़ुद ही को पाए कोई।

आ गई काली घटा झूम के मय-ख़ाने पर
तौबा कहती है कि मुझ को भी पिलाए कोई।

जब नज़र आता है वो जान-ए-तमन्ना दिल में
किस तमन्ना को लिए तूर पे जाए कोई।

ज़िंदगी क्या है फ़क़त मौत का जाम-ए-रंगीं
हस्त होना है तो हस्ती को मिटाए कोई।

हुस्न है महज़ जफ़ा इश्क़ है तस्वीर-ए-वफ़ा
रब्त का कुछ तो सबब मुझ को बताए कोई।

जज़्बा-ए-शौक़ उसे खींच के लाएगा यहाँ
आ नहीं सकता तो सौ बार न आए कोई।

दिल में यूँ पर्दा-नशीं रहने से हासिल क्या है
लुत्फ़ तो जब है 'रतन' सामने आए कोई।

Ratan Pandoravi
About the poet

Ratan Pandoravi

Rattan Pandoravi (Urdu: رتن پنڈوروی‎) as pen name born Rala Ram (Urdu: رالا رام‎) 7 July 1907 – 4 November 1990, was an Urdu poet and scholar from India. He has written several books of poetry collection, in which he speaks about the eternal sublime beauty th…

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