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भारतेन्दु हरिश्चंद्र

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(1)
किंशुक कानन होते थे लाल,
कदंब भी होकर पीले ढले।
आम भी भौंरे नचाते थे,
भौंरे, बिछाते थे पाँवडे पैरों तले ।।
कोयल कूक के जाती चली,
सिर पीट के जाते पपीहे चले।
चेत न होता हमें हम कौन हैं,
औ किसके रज से हैं पले ।।

(2)
बानी थे भूल रहे हम जो,
इनके औ हमारे बड़ों ने गढ़ी।
मर्म कहाँ मिलते इनके अब,
चित्ता में चाह थी और चढ़ी ।।
ये तो बिगाने थे जाते बने,
गुल बुल्बुल की बकवादें बढ़ीं।
नर्गिस थे नयनों में गडे नित।
शीन औ काफ से जीभ मढ़ी ।।

(3)
शिष्ट शराफत में थे लगें,
यह चंद औ सूर की बानी बड़ी।
केवल तानों में जाती तनी,
मुँह में मँगतों के थी जाती सड़ी।।
राज के काज को त्याग सभी,
फिर धर्म की धार पै आके अड़ी।
श्री हरिचंद्र जो होते न तो
रह जाती वहाँ की वहाँ ही पड़ी ।।

(ना. प्र. पत्रिका, अगस्त, 1912)

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