आशा और उद्योग

Ram Chandra ShuklaRam Chandra Shukla4 Oct 1884 – 2 Feb 1941

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(1)
हा! हा! मुझसे कहो न क्यों तुम, आशा कभी न होगी पूर्ण।
प्रतिफल इसका नहीं मिलेगा, बैरी मान न होता चूर्ण ।।
(2)
वृथा मुझे भय मत दिखलाओ, आशा से मत करो निराश।
कुछ भी बल हैं युगल भुजों में, तो बैरी होवेगा नाश ।।
(3)
कर्मों के फल के मिलने में यद्यपि हो जाती हैं देर।
तो भी उस जगदीश्वर के घर, होता नहीं कभी अंधेर ।।
(4)
करने दो प्रयत्न बस मुझको, देने दो जीवन का दान।
निजर् कर्त्तव्य पूर्ण कर लूँ मैं, फल का मुझे नहीं कुछ ध्यान ।।
(5)
यद्यपि मैं दुर्बल शरीर हूँ, जीवन भी मेरा नि:सार।
प्राणदान देने का तो भी, मुझको हैं अवश्य अधिकार ।।
(6)
जब तक मेरे इस शरीर में, कुछ भी शेष रहेंगे प्राण।
तब तक कर प्रयत्न मिटाउगाँ, अत्याचारी का अभिमान ।।
(7)
धर्म न्याय का पक्ष ग्रहण कर, कभी न दूँगा पीछे पैर।
वीर जनों की रीति यही हैं, नहीं प्रतिज्ञा लेते फेर ।।
(8)
देश दु:ख अपमान जाति का बदला मैं अवश्य लूँगा।
अन्यायी के घोर पाप का, दण्ड उसे अवश्य दूँगा ।।
(9)
यद्यपि मैं हूँ एक अकेला, बैरी की सेना भारी।
पर उद्योग नहीं छोडूँग़ा जगदीश्वर हैं सहकारी ।।
(10)
आशा! आशा! मुझको केवल तेरा रहा सहारा आज।
बल प्रदान तू मुझको करना रख लेना अब मेरी लाज ।।

('लक्ष्मी', नवंबर, 1912)

Ram Chandra Shukla
About the poet

Ram Chandra Shukla

Ram Chandra Shukla (4 October 1884 – 2 February 1941), better known as Acharya Shukla, is regarded as the first codifier of the history of Hindi literature in a scientific system by using wide, empirical research with scant resources and published Hindi Sahit…

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