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उखड़े हुए लोगों की क्रान्ति

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ओ वायु के टूटे हुए पंख,
ओ कवि,
धीरे-धीरे बुझते हुए, अन्धराते हुए समय के संग
क्या गाना पड़ा तुम्हें भी घायल सिपाहियों का गीत?
क्या झूलना पड़ा तुम्हें भी उन छतनारी डालों में
जिनके नीचे अगर पड़ जाती किसी कार की फुटलाइट
तो अजब हो जाता, गजब हो जाता...??
यह प्रश्न, किसी दूसरे से नहीं, मुझसे है
मेरी नई मान्यताएँ पूछती हैं मेरे नास्तिक संस्कारों से
शायद, अब भी, मैं समझता हूँ
कि दबी हुई है मेरी आत्मा गैरों के अधिकारों से

क्योंकि,
दूर खड़े कुछ अन्धे जीव लगातार पीट रहे हैं ढोल
गा रहे हैं रूमानी स्वर में आस्थाहीन शब्दों के बोल
एक झूठी प्रतिज्ञा, एक कमजोर निश्चय
चन्द देहवादी आकर्षण
खींचे ले जा रहे हैं उन्हें बाँहों में दबोचे
और, वे मसलना चाहते हैं सच्चाइयों की कलियाँ
भर देना चाहते हैं
विष से, वमन से, आँसू से, कुंठा से, धूल से सारी गलियाँ
वे चाहते हैं ‘नया’ समुद्र मन्थन
वे चाहते हैं नई सागरबालाओं का रक्तश्लथ क्रन्दन
वे चाहते हैं करना युगकन्या के साथ बलात्कार
और, यह बलात्कार एक क्रान्ति है
टूटे हुए अस्तित्वों की, बिखरे हुए आयामों की, उखड़े हुए लोगों की
ये लोग जो लंगड़े हैं
जिनकी बैसाखियाँ भी अन्धी गलियों में टूट गई हैं
ये लोग, और इनकी क्रान्ति
माशा-अल्लाह!
तो, गूँज रही है हवा में इनकी बेसुरी चीत्कार
व्यर्थ का आत्मदहन, व्यर्थ की दुविधाएँ, व्यर्थ का अहंकार

जलाओ, ओ रोशनी के फरिश्तो, दीये जलाओ
तुम्हारे साथी भटक गए हैं, उन्हें रास्ते पर लाओ

 

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Sootradhar