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रसोई

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प्याज़ काटते समय आँखों से निकले खारे-खारे आँसू
उसके साथ अचानक होंठों से फूट पड़ी मीठी हँसी
ये दोनों कड़ाही में मिलकर
घी में भुनते हैं जब
कसैलेपन और मिठास में धुँधवाती रसोई
आवाहन करती है देवताओं का
फड़कते हुए नथुनों वाले देवता
वे खिड़की से झाँक ही रहे होतें हैं,
भीतर आने के लिए ललचते हुए
तब तक हल्दी का उजला रूप रचा
धनिए की सुगंध में बसी
उतर आती हैं अन्नपूर्णा साक्षात्
रसोई में
अन्न के देव को करती साकार।

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Sootradhar