
अज़ीज़ो न पूछो कहाँ रह गया
जहाँ जी लगा बस वहाँ रह गया
जो रहना था बर्क़-ए-तपाँ रह गया
क़फ़स जल गया आशियाँ रह गया
हुआ मुंदमिल ज़ख़्म-ए-तीर-ए-नज़र
मगर दिल पे उस का निशाँ रह गया
गया आशियाना ज़माना हुआ
फ़क़त अब ग़म-ए-आशियाँ रह गया
ये दोनों भी मंज़िल पे पहुँचे मगर
ग़ुबार उड़ गया कारवाँ रह गया
जहाँ कारवाँ का हुआ था क़ियाम
वहाँ कारवाँ का निशाँ रह गया
इधर वहशत-ए-दिल मुझे ले उड़ी
उधर होश दामन-कशाँ रह गया
कहो बंदा-पर्वर हो किस सोच में
अभी क्या कोई इम्तिहाँ रह गया
हर इक चीज़ ऐ 'क़द्र' आई गई
ग़म-ए-इश्क़ ही जावेदाँ रह गया
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