कमाल-ए-ज़ब्त को ख़ुद भी तो आज़माऊँगी

Parveen ShakirParveen Shakir24 Nov 1952 – 26 Dec 1994

1 min read · 12.8K reads

कमाल-ए-ज़ब्त को ख़ुद भी तो आज़माऊँगी
मैं अपने हाथ से उस की दुल्हन सजाऊँगी

सुपुर्द कर के उसे चांदनी के हाथों
मैं अपने घर के अंधेरों को लौट आऊँगी

बदन के कर्ब को वो भी समझ न पायेगा
मैं दिल में रोऊँगी आँखों में मुस्कुराऊँगी

वो क्या गया के रफ़ाक़त के सारे लुत्फ़ गये
मैं किस से रूठ सकूँगी किसे मनाऊँगी

वो इक रिश्ता-ए-बेनाम भी नहीं लेकिन
मैं अब भी उस के इशारों पे सर झुकाऊँगी

बिछा दिया था गुलाबों के साथ अपना वजूद
वो सो के उठे तो ख़्वाबों की राख उठाऊँगी

अब उस का फ़न तो किसी और से मनसूब हुआ
मैं किस की नज़्म अकेले में गुन्गुनाऊँगी
[मनसूब= जुडा हुआ]

जवज़ ढूंढ रहा था नई मुहब्बत का
वो कह रहा था के मैं उस को भूल जाऊँगी
[जवज़=कारण]

सम'अतों में घने जंगलों की साँसें हैं
मैं अब कभी तेरी आवाज़ सुन न पाऊँगी

 

Parveen Shakir
About the poet

Parveen Shakir

Parveen Shakir or Parvin Shakir (Urdu: پروین شاکر‎) (24 November 1952 – 26 December 1994) was an Urdu poet, teacher and a civil servant of the Government of Pakistan. Parveen Shakir started writing at a very young age, penning both prose and poetry, and contr…

View profile & all 35 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like