अब कौन से मौसम से कोई आस लगाए

Parveen ShakirParveen Shakir24 Nov 1952 – 26 Dec 1994

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अब कौन से मौसम से कोई आस लगाए
बरसात में भी याद जब न उनको हम आए

मिटटी की महक साँस की ख़ुश्बू में उतर कर
भीगे हुए सब्जे की तराई में बुलाए

दरिया की तरह मौज में आई हुई बरखा
ज़रदाई हुई रुत को हरा रंग पिलाए

बूँदों की छमाछम से बदन काँप रहा है
और मस्त हवा रक़्स की लय तेज़ कर जाए

शाखें हैं तो वो रक़्स में, पत्ते हैं तो रम में
पानी का नशा है कि दरख्तों को चढ़ जाए

हर लहर के पावों से लिपटने लगे घूँघरू
बारिश की हँसी ताल पे पाज़ेब जो छंकाए

अंगूर की बेलों पे उतर आए सितारे
रुकती हुई बारिश ने भी क्या रंग दिखाए

Parveen Shakir
About the poet

Parveen Shakir

Parveen Shakir or Parvin Shakir (Urdu: پروین شاکر‎) (24 November 1952 – 26 December 1994) was an Urdu poet, teacher and a civil servant of the Government of Pakistan. Parveen Shakir started writing at a very young age, penning both prose and poetry, and contr…

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