पतंग की गुडी उडावन लागे व्रजबाल॥
सुंदर पताका बांधे मनमोहन बाजत मोरन के ताल॥१॥
कोउ पकरत कोउ खेंचत कोउ चंचल नयन विशाल।
कोउ नाचत कोउ करत कुलाहल कोउ बजावत बहोत करताल॥२॥
कोउ गुडीगुडीसो उरझावत आवत खेंचत दोरिरसाल।
परमानंद स्वामी मनमोहन रीझ रहेत एकही ताल॥३॥
पतंग की गुडी उडावन लागे व्रजबाल॥
सुंदर पताका बांधे मनमोहन बाजत मोरन के ताल॥१॥
कोउ पकरत कोउ खेंचत कोउ चंचल नयन विशाल।
कोउ नाचत कोउ करत कुलाहल कोउ बजावत बहोत करताल॥२॥
कोउ गुडीगुडीसो उरझावत आवत खेंचत दोरिरसाल।
परमानंद स्वामी मनमोहन रीझ रहेत एकही ताल॥३॥

Paramanandadas (1493-1583) is a poet in the eight poets (Ashthachap Kavi) of the Vallabh sect (Pushtimarga) who described the various pastimes of Lord Shri Krishna in their own positions. Paramanandadas, who had a prominent place among the poets of Ashtachap,…
View profile & all 28 Poems / Storiesबृंदावन क्यों न भए हम मोर।करत निवास गोबरधन ऊपर, निरखत नंद किशोर।
कौन रसिक है इन बातन कौ।नंद-नंदन बिन कासों कहिये, सुन री सखी मेरो दु:ख या मन कौ।
मैया मोहिं ऐसी दुलहिन भावै।का गोप की तनक ढोठिनियाँ,रुनक झुनक चलि आवै॥
कहा करौ बैकुंठहि जाय?जहाँ नहि नन्द जसोदा गोपी, जहाँ नहीं ग्वाल-बाल और गाय।
श्री लाल कछु कीजे भोजन तिल तिल कारी हों वारी हों।अब जाय बैठो दोउ भैया नंदबाबा की थारी हो॥१॥