इक ख़्वाब का ख़याल है दुनिया कहें जिसे

Pandit Brij Mohan Dattatreya KaifiPandit Brij Mohan Dattatreya Kaifi13 Dec 1866 – 1 Nov 1955

2 min read · 12.7K reads

इक ख़्वाब का ख़याल है दुनिया कहें जिसे
है इस में इक तिलिस्म तमन्ना कहें जिसे

इक शक्ल है तफ़ंनुन-ए-तबा-ए-जमाल की
इस से ज़्यादा कुछ नहीं कहें जिसे

ख़म्याज़ा है करिश्मा-परस्ती-ए-दहर का
अहल-ए-ज़माना आलम-ए-उक़्बा कहें जिसे

इक अश्क ओ वार्मीदा-ए-ज़ब्त ग़म-ए-फ़िराक़
मौज हवा-ए-शौक़ है दरिया कहें जिसे

बा-वस्फ़-ए-ज़ब्त-ए-राज़-ए-मोहब्बत है आश्कार
उक़्दा है दिल का अक़्दा-सुरय्या कहें जिसे

बरहम ज़न-ए-हिजाब है ख़ुद रफ़्तगी हुस्न
इक शान-ए-बे-ख़ुदी है ज़ुलेखा कहें जिसे

अक्स सफ़ा-ए-क़ल्ब का जौहर है आईना
वारफ़्ता-ए-जमाल ख़ुद-आरा कहें जिसे

रम शेवा है सनम तो है रम आश्ना ये दिल
हासिल है मुझ को देश मुहय्या कहें जिसे

ख़ूनी कफ़न ये सैंत के रक्खा है किस लिए
क़ातिल वो है की रश्क-ए-मसीहा कहें जिसे

सब कुछ है और कुछ भी नहीं दहर का वजूद
‘कैफ़ी’ ये बात वो है मुअम्मा कहें जिसे

Pandit Brij Mohan Dattatreya Kaifi
About the poet

Pandit Brij Mohan Dattatreya Kaifi

Pandit Brij Mohan Dattatreya Kaifi Dehlavi (13 December 1866 – 1 November 1955) was an Indian Urdu language writer, poet, playwright, novelist and essayist. Brij Mohan Dattatreya Kaifi was born on 13 December 1866 in Delhi. He was a student of Altaf Hussain H…

View profile & all 11 Poems / Stories

More from Pandit Brij Mohan Dattatreya Kaifi

  1. ज़िंदगी का किस के लिए मातम रहे

    ज़िंदगी का किस के लिए मातम रहेमुल्क बस्ता है मिटे या हम रहे

    12.8K reads
  2. फ़िदा अल्लाह की ख़िल्क़त पे जिस का जिस्म ओ जाँ होगा

    फ़िदा अल्लाह की ख़िल्क़त पे जिस का जिस्म ओ जाँ होगावही अफ़्साना-ए-हस्ती का मीर-ए-दास्ताँ होगा

    13.0K reads
  3. ढूँढने से यूँ तो इस दुनिया में क्या मिलता नहीं

    ढूँढने से यूँ तो इस दुनिया में क्या मिलता नहींसच अगर पूछो तो सच्चा आश्ना मिलता नहीं

    12.7K reads
  4. कोई दिल-लगी दिल लगाना नहीं है

    कोई दिल-लगी दिल लगाना नहीं हैक़यामत है ये दिल का आना नहीं है

    12.7K reads
  5. लुत्फ़ हो हश्र में कुछ बात बनाए न बने

    लुत्फ़ हो हश्र में कुछ बात बनाए न बनेआँख भी शौख़ सितम-गर से चुराए न बने

    12.8K reads

More Poetry & Stories You May Like