ज़िंदगी से हार मान ली मैंने...

Padma SachdevPadma Sachdev17 Apr 1940

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ज़िंदगी से हार मान ली मैंने
अपनी ही रेखा लांघ ली मैंने
सबको इसमें ही अगर सन्तोष है
सबकी इच्छा गांठ बांध ली मैंने

ज़िंदगी में झूठ हैं सच हैं कई
तुझसे बढ़कर कई सच है ही नहीं
इससे-उससे सबसे ही ऊपर है तू
सोच कर देखा तो तू कुछ भी नहीं

ज़िंदगी ये समय गुज़र जाए बस
एक बार पार ही हो जाऊं बस
फिर कभी आना ही पड़े तो सजन
फांस कोई गले में न डालूं बस

ज़िंदगी दुखती हुऊ एक रग़ मुई
आह भर कर बैठी हुई चीड़-सी
ये कभी भी उबलता चिनाब-सा
आज बहती मोरी से धारा कोई

Padma Sachdev
About the poet

Padma Sachdev

Padma Sachdev is an Indian poet and novelist. She is the first modern woman poet of the Dogri language. She also writes in Hindi. She has published several poetry collections, including Meri Kavita Mere Geet, which won the Sahitya Akademi Award in 1971.

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