हर तलबगार को मेहनत का सिला मिलता है

Nooh NarviNooh Narvi18 Sept 1878 – 1 Jan 1962

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हर तलबगार को मेहनत का सिला मिलता है

बुत हैं क्या चीज़ कि ढूँढे से ख़ुदा मिलता है

वक़्त पर काम न आया दिल-ए-नाशाद कभी

टूट कर ये भी उसी शोख़ से जा मिलता है

वो जो इंकार भी करते हैं तो किस नाज़ के साथ

मुझ को मिलने में न मिलने का मज़ा मिलता है

ये कुदूरत ये अदावत ये जफ़ा ख़ूब नहीं

मुझ को मिट्टी में मिला कर तुम्हें क्या मिलता है

'नूह' हम को नज़र आया न यहाँ बुत भी कोई

लोग कहते थे कि क़ाबे में ख़ुदा मिलता है

Nooh Narvi
About the poet

Nooh Narvi

Nooh Narvi or Muhammad Noah (1878- 1962 ) was born in district Rae Bareli (Uttar Pradesh). He learnt Arabic and Persian from Mir Najaf Ali and acquired a level of excellence in these languages. He also learnt English. Nuh is well known for his spontaneity and…

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