विजन गिरीपथ पर चटखती पत्तियों का लास
हृदय में निर्जल नदी के पत्थरों का हास
'लौट आ, घर लौट' गेही की कहीं आवाज़
भींगते से वस्त्र शायद छू गया वातास ।
विजन गिरीपथ पर चटखती पत्तियों का लास
हृदय में निर्जल नदी के पत्थरों का हास
'लौट आ, घर लौट' गेही की कहीं आवाज़
भींगते से वस्त्र शायद छू गया वातास ।

Namvar Singh (28 July 1926 – 19 February 2019) was an Indian literary critic, linguist, academician and theoretician. He received his doctorate degree from Banaras Hindu University where he also taught for some time. He served as a professor of Hindi literatu…
View profile & all 13 Poems / Storiesपारदर्शी नील जल में सिहरते शैवालचाँद था, हम थे, हिला तुमने दिया भर ताल
धुन्धुवाता अलाव, चौतरफ़ा मोढ़ा मचियापड़े गुड़गुड़ाते हुक्का कुछ खींच मिरजई
आज तुम्हारा जन्मदिवस, यूँ ही यह संध्याभी चली गई, किंतु अभागा मैं न जा सका
मँह-मँह बेल कचेलियाँ, माधव माससुरभि-सुरभि से सुलग रही हर साँस
पथ में साँझपहाड़ियाँ ऊपर